7.आयुर्वेदिक आयुर्वेद विषय पर आलोचना सत्र

 

आयुर्वेद में असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग, प्रज्ञापराध एवं परिणाम का विस्तृत विज्ञान



आयुर्वेद में हमारे शरीर को रोगों का घर और व्याधियों का मंदिर माना गया है, जिसमें 18,000 प्रकार की बीमारियाँ वात, पित्त और कफ दोषों के कुपित व क्रोधित होने से उत्पन्न होती हैं। व्याधियों के उत्पन्न होने के मुख्य रूप से तीन कारण हैं:


1. असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग (इंद्रियों का उनके विषयों के साथ अनुचित संबंध)

2. प्रज्ञापराध (जानबूझकर बुद्धि व ज्ञान के विरुद्ध गलत आचरण करना)

3. परिणाम (काल/समय व ऋतु परिवर्तन का प्रभाव)


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असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग का त्रिविध विज्ञान


- अतियोग: किसी भी इंद्रिय के विषय का अत्यधिक या अति-तीव्र मात्रा में प्रयोग करना।

- अयोग (हीनयोग): इंद्रिय के विषय का बिल्कुल प्रयोग न करना या उससे सर्वथा विमुख रहना।

- मिथ्यायोग: इंद्रिय के विषय का गलत, प्रकृति-विरुद्ध, या अपवित्र तरीके से प्रयोग करना।


आंतरिक शारीरिक प्रभाव (Internal Science):


जब इंद्रियों का अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग होता है, तो शरीर में पाचक अग्नि, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ), पंच वायु (प्राण, उदान, समान, व्यान, अपान) तथा धातुएँ (विशेषकर शुक्र धातु और मल) दूषित हो जाती हैं। इससे शरीर के 3.5 करोड़ स्नायुमंडल, 3.5 करोड़ रोम छिद्र, 3.5 करोड़ धमनियाँ, 3.5 करोड़ शिराएँ और 360 संधियाँ निर्बल हो जाती हैं तथा भयंकर शारीरिक व मानसिक रोग जन्म लेते हैं।


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प्रत्येक इंद्रिय का पूर्ण विज्ञान, सभी उदाहरण एवं दुष्परिणाम


1. घ्राणेंद्रिय (नाक / गंध का विज्ञान)


अतियोग:


- अत्यधिक उग्र या तीव्र इत्र/परफ्यूम लगाना या वातावरण में बहुत अधिक सुगंधित खुशबू फैलाना।

- दुष्परिणाम: सिरदर्द होना, आँखों में जलन, नाक व आँखों से पानी टपकना तथा मस्तिष्क पर तुरंत बुरा प्रभाव पड़ना।


अयोग:


- ऐसे स्थान पर रहना जहाँ कोई भी सुगंध या दुर्गंध (कोई भी गंध) ग्रहण करने को न मिले।

- दुष्परिणाम: सूँघने की क्षमता सदा के लिए नष्ट हो जाना; बोधक कफ, उदान वायु, तर्पक पित्त, प्राण वायु और अवलंबक कफ का विकृत हो जाना; जिससे संन्यास (कोमा/बेहोशी) या मूर्च्छा जैसे भयंकर लक्षण उत्पन्न होना।


मिथ्यायोग के सभी उदाहरण:


1. बासी/सड़ा सामान: फ्रिज या डिब्बों से निकाले गए सड़े-गले सामान की दुर्गंध सूँघना।

2. पसीने के कपड़े: 2 दिन तक पहने गए पसीने से लथपथ कपड़ों की दुर्गंध।

3. द्वेष/क्रोध से बना भोजन: गुस्से, जलन या द्वेष की भावना से बनाए गए या जले हुए भोजन से आने वाली अजीब दुर्गंध।

4. रासायनिक धुआँ: अगरबत्ती या धूपबत्ती की फैक्ट्रियों में प्रयुक्त केमिकल्स और तीखे धुएँ की गंध में रहना (सिर घूमना व बेचैनी होना)।

5. टॉयलेट एयर फ्रेशनर व अत्यधिक बैठना:

   - टॉयलेट में एयर फ्रेशनर लगाकर दुर्गंध दबाना, ताकि लोग 30-30 मिनट बैठकर अखबार पढ़ें।

   - विशेष विज्ञान: मलद्वार पर यमदेवता का वास माना गया है। शौच के लिए 5 मिनट से अधिक बैठना यमराज (मृत्यु) के प्रभाव को आमंत्रित करता है, जो आयु का हास करता है।

   - केमिकल युक्त सुगंध से दुर्गंध भले न महके, पर वह वायु शरीर में जाकर विषैला प्रभाव डालती है, मच्छर पैदा करती है और रोग उत्पन्न करती है।


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2. रसनेन्द्रिय (जीभ / स्वाद का विज्ञान)


जीभ रसों का बोध कराती है, इसलिए इसे 'रसनेन्द्रिय' या 'रसना' कहा गया है।


अतियोग:


- स्वाद के लालच में आवश्यकता से अधिक खाना (जैसे दावत में 2 निवाले अतिरिक्त खा लेना), खुशबू आने पर बिना भूख के खा लेना, या कड़क चाय की बार-बार चुस्कियाँ लेना।

- दुष्परिणाम: प्राण वायु विकृत होती है; मधुमेह (Diabetes), प्रमेह, उच्च रक्तचाप (BP), हार्ट ब्लॉक, सर्वाइकल, मेरुदंड/कमर में दर्द, घुटनों-हड्डियों-कंधों में दर्द होना।


अयोग:


- भोजन और जल का पूरी तरह त्याग कर देना या अत्यधिक कठोर उपवास रखना।

- दुष्परिणाम: वात का अत्यधिक बढ़ना, त्रिदोष व धातुओं का क्षय होना, केवल अस्थि व मल शेष रहना और शरीर का पूर्णतः शक्तिहीन व ऊर्जाहीन हो जाना।


मिथ्यायोग के सभी उदाहरण:


1. 105 प्रकार के विरुद्ध आहार (Viruddha Ahara):

   - दूध/दही के साथ नमक: दही या दूध में नमक मिलाकर खाना।

   - दही और बैंगन: दही के साथ बैंगन मिलाकर भरता बनाकर खाना।

   - दही-बड़ा: उड़द की दाल और दही को मिलाकर दही-बड़ा खाना।

   - मदिरा व उड़द: शराब/मदिरा के साथ उड़द दाल का सेवन करना।

   - गर्म दही: दही को गर्म करके या छौंक/खटाई डालकर खाना।

2. भोजन के गलत नियम:

   - जब खाना चाहिए तब न खाना और जब नहीं खाना चाहिए तब खाना।

   - बार-बार (असमय) खाते रहना।

   - खड़े होकर भोजन करना।

   - भोजन बिना चबाए सीधा निगल जाना।

   - दुष्परिणाम: पाचक अग्नि, रंजक पित्त, समान वायु और अपान वायु का बिगड़ना; हाथों-पैरों में सुन्नपन आना, सर्वाइकल और पाचन तंत्र का विकृत होना।


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3. स्पर्शेंद्रिय (त्वचा / स्पर्श का विज्ञान)


अतियोग:


- स्नान: ग्रीष्म ऋतु में ठंडे पानी से नहाना सही है, पर सालों-साल केवल अत्यधिक बर्फीले या गर्म जल से ही नहाते रहना।

- लेप/उबटन: गोरा दिखने के लालच में फेयरनेस क्रीम, उबटन, बेसन, चने का आटा या विभिन्न तेलों को प्रतिदिन बिना विधि-विधान और बिना मात्रा के लगाते रहना।


अयोग:


- शरीर पर कभी भी तेल मालिश (अभ्यंग), उबटन या लेप न लगाना।

- दुष्परिणाम: व्यान वायु, अपान वायु और रंजक पित्त का बिगड़ना; संधियों (जोड़ों) में दर्द, पसीने की भयंकर दुर्गंध, मन का अशांत होना और हृदय की दुर्बलता।

- त्वचा व मालिश का महत्व: शरीर के 3.5 करोड़ स्नायुमंडल, 3.5 करोड़ रोम छिद्र, 3.5 करोड़ शिराएँ, 3.5 करोड़ धमनियाँ और 360 संधियाँ (जोड़) मालिश व उबटन से बल प्राप्त करते हैं। इससे दृष्टि, स्मरण शक्ति, धारणा शक्ति व बुद्धि निर्मल होती है।


मिथ्यायोग के सभी उदाहरण:


1. ऋतु-विरुद्ध स्नान:

   - गर्मी में गर्म पानी से नहाना: यह सोचकर नहाना कि गर्मी से शरीर ठंडा होगा; इससे लू लगना और हृदय का कमजोर होना।

   - सर्दी में ठंडे पानी से नहाना: इससे कफ बढ़ना, थायराइड, अग्निमांद्य (पाचन मंद होना), मांसपेशियों में दर्द और चिड़चिड़ापन होना।

2. टैटू (Tattoo) गुदवाना:

   - सुई/कलम से त्वचा पर आघात कर शिवजी, हनुमान जी, प्रेमिका, पत्नी, माता-पिता या अपना नाम/चित्र उकेरना।

   - दुष्परिणाम: भयंकर वेदना, अंग का सूजना, बुखार, चक्कर आना, खाना न पचना, पेट दर्द, नर्वस सिस्टम प्रभावित होना, शुक्र धातु का क्षय होना और एकाग्रता/सोचने की क्षमता नष्ट होना।

3. अशुद्ध/अपावन वस्तुएँ धारण करना:

   - शेर का नाखून, शेर के बाल, बिल्ली की हड्डी, मोर की हड्डी या किसी जीव के दांत धारण करना।

   - मृत गोमाता के दांत को ताबीज में भरकर गले में पहनना।

   - तांत्रिक क्रिया के चक्कर में अनामिका उंगली को खरोंचकर खून निकालना और खाने में मिलाकर वशीकरण के लिए प्रयोग करना।

   - श्मशान की भस्म/राख साथ रखना या श्मशान के पेड़ों की परिक्रमा करके बरकत की आस लगाना।

   - विशेष विज्ञान: बाल, हड्डी, दांत, पसीना आदि अपवित्र वस्तुएँ हैं। इन्हें धारण करने से मानस दोष (सत्व नष्ट होकर तम/रज बढ़ना) उत्पन्न होता है और सूक्ष्म शरीर दूषित होकर 18,000 प्रकार के रोग जन्म लेते हैं।


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4. वाग्-इन्द्रिय (मुख / वाणी का विज्ञान)


अतियोग: दिनभर लगातार बोलते रहना, अत्यधिक बातें या भाषण करना।


- दुष्परिणाम: वात वृद्धि, फेशियल पैरालिसिस (मुख का लकवा), मूकता, गर्दन का जकड़ना (Spondylitis/Cervical), पित्त वृद्धि, एनीमिया, लिवर/किडनी/पैंक्रियाज (अग्न्याशय) व एंडोक्राइन सिस्टम का बिगड़ना और प्रोस्टेट ग्रंथि के रोग।


अयोग: बिल्कुल न बोलना, पूरी तरह मूक या मौन होकर बैठ जाना।


- दुष्परिणाम: मन का स्तंभित होना, उदान वायु का कुपित होना और गले/वाणी में जड़ता (हकलाहट या गूँगापन) आना।


मिथ्यायोग के सभी उदाहरण:


1. दुर्जनों, दुष्टों या माता-पिता/गुरु का अपमान करने वालों से वार्तालाप करना।

2. दूसरों की निंदा करना, गाली-गलौज करना, छल-कपट की बातें करना।

3. दूसरों को नीचा दिखाने के लिए अपनी झूठी प्रशंसा (बड़ाई) करना।

4. देवताओं, गुरु, माता-पिता का अनादर करना या पैरों से अग्नि का स्पर्श करना।

   - विशेष विज्ञान: ग्रन्थ 'निदान रत्नाकर' के अनुसार, पाप कर्म करने वाले व्यक्ति से बात करने पर उसके पाप का 6% भाग (छठा हिस्सा) बात करने वाले को मिलता है, जिससे सूक्ष्म शरीर दूषित होता है और व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।


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5. पायु इन्द्रिय (मलद्वार / उत्सर्ग का विज्ञान)


अतियोग: दिन में 3-4 बार या उससे अधिक बार मल त्याग (शौच) करने जाना।


- सूत्र: "शुक्रायत्तं बलं, मलायत्तं जीवनम्" — शुक्र धातु शरीर का बल है और मल जीवन का आधार है।

- दुष्परिणाम: अतिसार, ज्वरातिसार, धातुओं का क्षय, अत्यधिक दुर्बलता, दृष्टि मंद होना, बाल सफेद होना/झड़ना, सोचने-समझने व धैर्य की शक्ति नष्ट होना।


अयोग: मल का रुक जाना, कब्ज होना, या दिन-दिन भर/हफ्ते भर मल त्याग न होना।


- दुष्परिणाम: समान व अपान वायु का भयंकर अवरोध होना, शरीर में विष फैलना, जिससे प्राणवायु संकट में पड़ सकती है।


मिथ्यायोग के सभी उदाहरण:


1. असमय शौच लगना: सुबह-शाम के प्राकृतिक समय पर पेट साफ न होना, बल्कि दोपहर में, खाना खाते ही, काम पर निकलते समय, दौड़ते समय या तैरते समय अचानक तीव्र शौच लगना।

2. अपूर्ण मल त्याग: टॉयलेट जाने पर थोड़ा सा मल आना पर पेट साफ न महसूस होना, जिससे बार-बार 2-3 बार चक्कर लगाना पड़े।

   - दुष्परिणाम: प्रमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप (BP), घुटनों/जोड़ों में दर्द, बाल सफेद होना/झड़ना, गंजापन, दृष्टि मंद होना, अनिद्रा, वात रोग।


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6. कर्ण इन्द्रिय, कर्णवेध संस्कार एवं रहस्य


- कर्णवेध संस्कार का विज्ञान: कान के निचले भाग में 'विधुर मर्म' (107 मर्मों में से एक) स्थित होता है।

- 'राजदूत' का कार्य: आयुर्वेद में इस विधुर मर्म को 'राजदूत' कहा गया है, जो बिना रुके मस्तिष्क को संकटों व अनुभूतियों का संदेश भेजता है।

- लाभ: कर्णवेध से संन्यास (कोमा), मूर्च्छा व मानसिक दुर्बलता से बचाव होता है तथा बच्चों में दिव्य दृष्टि व सकारात्मक विचार विकसित होते हैं।

- स्त्री-पुरुष का भेद व नियम: पारंपरिक रूप से पुरुषों में दायाँ और स्त्रियों में बायाँ कान छिदवाने का नियम रहा है (क्योंकि पुरुषों में पिंगला/सूर्य नाड़ी और स्त्रियों में इड़ा/चंद्र नाड़ी की प्रधानता होती है)। परंतु पूर्ण स्वास्थ्य लाभ के लिए पुरुषों और स्त्रियों दोनों को दोनों कानों का वेध कराना चाहिए।

- तिलक विधान: सुबह स्नान के पश्चात दोनों कानों सहित शरीर के 12 स्थानों पर गोपीचंदन/चंदन का तिलक लगाने से भी इंद्रियों की रक्षा होती है।

7. टैटू का दुष्प्रभाव एवं आयुर्वेदिक उपचार 

 टैटू बनवाने से नर्वस सिस्टम, विचार शक्ति और शुक्र धातु पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ता है।

आयुर्वेदिक उपचार:


- औषधि मिश्रण: ब्राह्मी चूर्ण (50 ग्राम), शंखपुष्पी चूर्ण (50 ग्राम) तथा अश्वगंधा चूर्ण (50 ग्राम) को आपस में मिला लें।

- सेवन विधि: 1 ग्राम की मात्रा दिन में 2 से 3 बार शहद के साथ खाली पेट लगातार लगभग 100 दिनों तक सेवन करें। इससे टैटू के दुष्प्रभाव दूर होते हैं।


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8. अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं संस्कार


- 16 संस्कार: आयुर्वेद में गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का विधान बताया गया है जो जीवन को अनुशासित और रोगमुक्त रखते हैं।

- पूर्वजन्मकृत कर्म एवं व्याधि: ग्रन्थ 'निदान रत्नाकर' के अनुसार पूर्वजन्म के पाप कर्म भी इस जन्म में व्याधि/रोग के रूप में पीड़ित करते हैं।


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