3.आयुर्वेद विषय पर आलोचना सत्र



1. मंगलाचरण एवं सत्र का उद्देश्य

व्याख्यान का शुभारंभ आयुर्वेद के जनक भगवान श्री धन्वंतरि जी को प्रणाम कर मंगलाचरण से किया गया।

इस आलोचना सत्र का मुख्य उद्देश्य शरीर में दोष, धातु और मल के सिद्धांतों को सरलता से समझना और दैनिक जीवन में उनके अनुप्रयोग को जानना है।

2. दोष, धातु और मल की अवधारणा एवं उदाहरण

चरक संहिता एवं शारंगधर संहिता के अनुसार वात, पित्त और कफ की तीन अवस्थाएँ होती हैं:

दोष (Dosha): जब ये शरीर के अन्य घटकों को दूषित करते हैं या उनका संग्रह करते हैं, तब इन्हें 'दोष' कहा जाता है।

धातु (Dhatu): जब ये शरीर की क्रियाओं को सम्भालते हैं और शरीर को धारण करते हैं, तब इन्हें 'धातु' कहा जाता है।

मल (Mala): जब ये लंबे समय तक किसी एक स्थान पर रुक जाते हैं, गतिहीन हो जाते हैं और शरीर को मलीन कर देते हैं, तब इन्हें 'मल' कहा जाता है।

व्याख्यान में दिए गए उदाहरण:

नदी के जल का उदाहरण: जैसे नदी का जल निरंतर बहता रहे तो शुद्ध रहता है, उसी प्रकार वात, पित्त और कफ का शरीर में निरंतर प्रवाहित होना ही स्वास्थ्य है।

रोग का कारण (रुक जाना):

यदि वात एक जगह रुक जाए, तो वात रोग उत्पन्न होता है।

यदि कफ मस्तिष्क या सिर में जमा हो जाए, तो जल भर जाने से 'हाइड्रोसेफ़लस' (Hydrocephalus) जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सूर्य, चंद्रमा और श्वास का उदाहरण: जिस प्रकार ब्रह्मांड में सूर्य और चंद्रमा निरंतर चलते रहते हैं, उसी प्रकार शरीर में पित्त और कफ का प्रवाह आवश्यक है। वात के संदर्भ में जैसे श्वास चलती रहती है तो जीवन है, श्वास रुकते ही मृत्यु निश्चित है।

3. शरीर, मन और इंद्रियों की क्रियाएँ एवं स्वास्थ्य का नियम

मानव जीवन में तीन स्तरों पर क्रियाएँ होती हैं:

शारीरिक क्रियाएँ: भोजन करना, शौच जाना, सोना, उठना, व्यापार/कार्य करना, दान-पुण्य करना।

मानसिक क्रियाएँ: विचार करना, ईश्वर का स्मरण करना, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस या शिव पुराण का चिंतन करना।

इंद्रिय क्रियाएँ: 10 इंद्रियों (5 ज्ञानेंद्रियों एवं 5 कर्मेंद्रियों) द्वारा अपने-अपने विषयों का संपादन करना।

कर्म सिद्धांत एवं विकृति के उदाहरण:

गीता का संदर्भ: श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार कर्म करना अनिवार्य है; बिना कर्म के शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता।

शारीरिक विकृति का उदाहरण: भोजन के समय शौच जाना, शौच के समय भोजन करना या सोने के समय खाना खाना शारीरिक विकृति लाता है।

मानसिक विकृति का उदाहरण: चार संध्यावेलाओं के समय ईश्वर या कुलदेवता के ध्यान के बजाय मन में वासना, ईर्ष्या या हिंसात्मक विचार लाना मानसिक रोगों को जन्म देता है।

चरक संहिता के अनुसार स्वास्थ्य: जब तक शरीर, मन और इंद्रियों की क्रियाओं में परस्पर तालमेल रहता है, तब तक व्यक्ति स्वस्थ है; तालमेल बिगड़ते ही 'व्याधि' (रोग) उत्पन्न होती है।

4. शरीर में त्रिदोष के स्थान (त्रिस्तंभ एवं त्रिभुवन की तुलना)

जैसे कोई घर या बंगला पिलरों पर टिका होता है, वैसे ही शरीर वात, पित्त और कफ रूपी तीन स्तंभों (त्रिस्तंभ) पर टिका है।

व्याख्यान में ब्रह्मांड के तीन लोकों से शरीर के स्थानों की तुलना की गई है:

स्वर्ग लोक (कफ स्थान): सिर से लेकर हृदय/छाती तक का भाग कफ का स्थान (ब्रह्मा जी का स्थान) माना गया है।

मृत्यु लोक (पित्त स्थान): हृदय से लेकर नाभि (कमर) तक का भाग पित्त का स्थान माना गया है।

पाताल लोक (वात/वायु स्थान): नाभि से लेकर पैरों के अंगूठे (तलवों) तक का भाग वात का स्थान माना गया है।

5. दोषों के आधार पर रोगों को पहचानने का सरल नियम

शरीर के प्रभावित क्षेत्र के आधार पर कोई भी व्यक्ति स्वयं दोष की पहचान कर सकता है:

कफ विकार (सिर से हृदय तक): सर्दी, सिर में भारीपन, छाती में कफ जमना, सांस की तकलीफ, गले में खराश होना।

पित्त विकार (हृदय से नाभि तक): गैस, एसिडिटी, अल्सर, पेट में जलन या दर्द, सीने में जलन, सिरदर्द।

वात विकार (नाभि से पैरों के अंगूठे तक): घुटनों/पैरों में दर्द, सूजन, ऐंठन, सुन्नता, जलन (वात के 80 प्रकार के लक्षण)।

6. छह रसों (6 Tastes) द्वारा स्व-उपचार

आयुर्वेद के 6 रसों के माध्यम से त्रिदोष को संतुलित किया जा सकता है:

मधुर (मीठा)

अम्ल (खट्टा)

लवण (नमकीन)

कटु (तीखा/चरपरा)

तिक्त (कड़वा, जैसे नीम)

कषाय (कसैला, जैसे आंवला, जामुन, आम की छाल, अनार/कचनार, कच्चा केला)

उपचार का नियम:

कफ रोग होने पर: मधुर, अम्ल, लवण रस घटाएं तथा कटु, तिक्त, कषाय रस बढ़ाएं (2-3 दिन से 1 सप्ताह में लाभ मिलता है)।

पित्त रोग होने पर: कटु, अम्ल, लवण रस घटाएं तथा मधुर, तिक्त, कषाय रस बढ़ाएं।

वात रोग होने पर: कटु, तिक्त, कषाय रस घटाएं तथा मधुर, अम्ल, लवण रस बढ़ाएं।

7. सुश्रुत संहिता का सिद्धांत: विसर्ग, आदान और विक्षेप

महर्षि सुश्रुत के अनुसार: "विसर्गादानविक्षेपैः सोमसूर्यानिला यथा। धारयन्ति जगद्देहं कफपित्तअनिलास्तथा॥"

जिस प्रकार चंद्रमा, सूर्य और वायु ब्रह्मांड को धारण करते हैं, उसी प्रकार कफ, पित्त और वात शरीर को धारण करते हैं:

(क) विसर्ग (चंद्रमा = कफ)

अर्थ: बिना मांगे स्वेच्छा से दान करना।

ब्रह्मांडीय उदाहरण: रात में चंद्रमा शीतल अमृत किरणों का दान करता है। भीषण गर्मी के बाद रात में चंद्रमा के नीचे बैठने पर शरीर में स्वतः शीतलता आ जाती है।

शरीर में उदाहरण: मुख में बोधक कफ (लार) बिना मांगे 24 घंटे निरंतर स्रावित होकर मुख को गीला रखता है। योगशास्त्र में खेचरी मुद्रा द्वारा इसी अमृत के पान की बात कही गई है।

शरद पूर्णिमा का उदाहरण: शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की 16 कलाएं पूर्ण होती हैं। उस रात खुले आसमान के नीचे खीर बनाकर रखने से उसमें औषधीय गुण आते हैं, जो दमा, कफ व सांस के रोगियों को खिलाई जाती है।

(ख) आदान (सूर्य = पित्त)

अर्थ: बिना पूछे या बिना बताए ग्रहण/सोख लेना।

व्यावहारिक उदाहरण: जैसे सरकार बिना पूछे टैक्स/सेल टैक्स ले लेती है। उत्तरायण में सूर्य पूरे ब्रह्मांड से जल/रस सोख लेता है।

शरीर में उदाहरण (दोपहर की प्यास): दोपहर का समय पित्त (सूर्य) का होता है, इसलिए दोपहर में सभी को प्यास लगती है क्योंकि पित्त शरीर के जल को सोखता है।

बीमारियों में प्रभाव: पांडु रोग (एनीमिया), प्लेटलेट्स कम होना या लिवर की खराबी में रक्त का जल भाग (रक्त में 90% जल होता है) सोख लिया जाता है, जिससे रक्त गाढ़ा होकर कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लीसराइड बढ़ाता है। महिलाओं में प्रदर/रक्तस्राव के रोग भी पित्त काल (दोपहर/रात) में अधिक बढ़ते हैं।

(ग) विक्षेप (वायु = वात)

अर्थ: चीजों को बिखेरना या टेढ़ा-मेढ़ा चलना।

व्यावहारिक उदाहरण (नटखट बालक व बवंडर): जैसे घर का नटखट बालक सामान बिखेर देता है। जब हवा सामान्य होती है तो धूल उड़ती है, परंतु जब चक्रवात/बवंडर ('बाबाझोड') आता है, तो बरगद के बड़े पेड़, बिजली के खंभे व झोपड़ियाँ उखाड़ फेंकता है।

शरीर में उदाहरण: जब शरीर में वायु विकृत होती है, तो व्यक्ति का संतुलन बिगड़ता है, चक्कर आने लगते हैं और व्यक्ति गिर पड़ता है।

8. त्रिदोषों की गति एवं प्राणियों से तुलना

महर्षि कणाद एवं रावण संहिता के अनुसार दोषों की गति तीन जीवों जैसी होती है:

वात (वायु): सर्प (सांप) की भांति टेढ़ी-मेढ़ी गति।

पित्त: मण्डूक (मेंढक) की भांति उछलने वाली गति (बरसात में मेंढक अधिक उत्पन्न होकर टर्र-टर्र करते हैं)।

कफ: हंस या हाथी की भांति मंद व गंभीर गति।

9. आधुनिक विज्ञान, 'ऊर्जा बनाम द्रव्य' एवं 'सेंसर' का सिद्धांत

प्रश्न: आधुनिक विज्ञान वात, पित्त और कफ को सीधे क्यों नहीं स्वीकार करता?

व्याख्यान का तर्क (ऊर्जा बनाम द्रव्य):

अष्टांग हृदय के कुछ व्याख्याकार त्रिदोषों को 'ऊर्जा' मानते हैं, परंतु आचार्य चरक और आचार्य सुश्रुत इन्हें ऊर्जा न मानकर 'द्रव्य' (Substance) मानते हैं।

छत व दीवारों का उदाहरण: घर की छत चार दीवारों पर टिकी है, दीवारें नींव पर, नींव पृथ्वी पर और पृथ्वी सूर्य पर। इसलिए छत या दीवारें स्वतंत्र ऊर्जा नहीं हैं।

सिलेंडर व चूल्हे का उदाहरण: गैस सिलेंडर व लकड़ी घर में रखी रहे, जब तक अग्नि का संयोग नहीं होगा, भोजन नहीं पकेगा।

ग्रहणी नाड़ी एवं ऑटोमैटिक 'सेंसर' का उदाहरण:

जब हम भोजन करते हैं, तो अन्नप्रणाली से आमाशय तक 'ग्रहणी नाड़ी' भोजन को ग्रहण करती है।

सुश्रुत संहिता के अनुसार ग्रहणी नाड़ी सेंसर (Sensor) की भांति कार्य करती है।

कोरोना काल की सैनिटाइजर मशीन का उदाहरण: जैसे ऑटोमैटिक सैनिटाइजर मशीन के नीचे हाथ रखते ही सेंसर पहचान कर सैनिटाइजर छिड़क देता है, वैसे ही भोजन ग्रहणी के पास पहुँचते ही वह जठराग्नि को संकेत भेजती है और अग्नि प्रदीप्त हो जाती है।

चूंकि वात, पित्त और कफ भोजन, जल और वायु के आहार-विहार पर निर्भर करते हैं, इसलिए ये 'द्रव्य' हैं, केवल अमूर्त ऊर्जा नहीं।

10. आयुर्वेद के अनुसार 9 प्रकार के 'द्रव्य'

आचार्य चरक के अनुसार जिस वस्तु का अपने गुण और कर्म से नित्य (समवाय) संबंध होता है, उसे द्रव्य कहते हैं। सृष्टि में 9 प्रकार के द्रव्य बताए गए हैं:

आकाश

वायु

तेज (अग्नि)

जल

पृथ्वी (ये 5 पंचमहाभूत हैं)

आत्मा (मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंग सभी में वास करने वाली)

मन

काल (समय/अवस्था)

दिशा (10 दिशाएँ

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