बसंत ऋतु भाग२१

 



वैद्यमित्र सत्यवान नायक जी सभी श्रोताओं का "वंदे मातरम" के साथ स्वागत करते हैं और भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्री धन्वंतरि को नमन कर अपनी बात शुरू करते हैं।

२. आयुर्वेद सम्मत काल गणना का खगोलीय विज्ञान

वैद्य जी कहते हैं कि हमारे जीवन और स्वास्थ्य का सीधा संबंध समय चक्र से है, जिसे आयुर्वेद में काल गणना कहा गया है:

१ वर्ष: इसमें कुल १२ मास (महीने) होते हैं।

१ प्रहर: यह ठीक ३ घंटे की अवधि का होता है। और चार पहर को दिन और रात कहा जाता है


१  , वार (दिन और रात): २४ घंटे के समय को एक वार कहा जाता है, जिसमें कुल ८ प्रहर होते हैं (४ प्रहर का दिवस और ४ प्रहर की रात्रि)।


दिवस और रात्रि: सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को 'दिवस' (दिन) और सूर्यास्त से सूर्योदय तक के समय को 'रात्रि' कहा जाता है।  एक दिन और एक रात के मिलन को एक बार कहा जाता है जैसे सोमवार मंगलवार


सप्ताह और पक्ष: सूर्योदय से पुनः सूर्योदय तक के नियत काल चक्र को जोड़कर ७ दिनों का एक 'सप्ताह' बनता है। दो सप्ताह मिलकर एक 'पक्ष' (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) का निर्माण करते हैं।


मास और ऋतु: दो पक्षों को मिलाकर एक 'मास' (महीना) बनता है और दो मासों को मिलाकर एक 'ऋतु' बनती है।


अयन और वर्ष: तीन ऋतुओं को मिलाकर एक 'अयन' (उत्तरायण या दक्षिणायन) बनता है और दो अयन मिलकर पूरा एक 'वर्ष' बनता है।


🗓️ शिशिर से वसंत ऋतु का सटीक संक्रमण समय


ऋतु परिवर्तन हवा में अचानक नहीं होता। खगोलीय गणना के अनुसार इसका एक सटीक क्षण होता है:


"प्रातःकाल ठीक ०८:३३ बजे शिशिर ऋतु की सीमा (कार्यकाल) धरती पर समाप्त हो जाती है और ठीक ०८:३४ बजे से 'ऋतुराज वसंत' का पदार्पण हो जाता है।"


यह वसंत ऋतु का चक्र पूरे दो महीने (फाल्गुन और चैत्र) तक चलेगा।


एक जिज्ञासा का समाधान: वैद्य जी कहते हैं कि स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि फाल्गुन-चैत्र में वसंत पहले ही आ जाता है और चैत्र-वैशाख में ग्रीष्म आता है। वे श्रोताओं को आश्वस्त करते हैं कि यह कालगणना और खगोलीय ज्योतिष का एक गहरा विषय है, जिस पर वे एक अलग स्वतंत्र सत्र में विस्तार से चर्चा करेंगे; इसलिए अभी हमारा ध्यान केवल वसंत ऋतुचर्या पर केंद्रित रहेगा। वे स्पष्ट करते हैं कि यह ज्ञान ग्रंथों (चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भावप्रकाश, अष्टांग हृदय और स्वस्थ्यवृत्त) के मंथन से निकाला गया निष्कर्ष है।


३. वसंत ऋतु का शरीर पर प्रभाव (रोगों का मूल कारण)


शिशिर (सर्द) ऋतु के दौरान ठंडे मौसम के कारण हमारे शरीर के भीतर कफ का भारी संचय (accumulation) हो जाता है।


कफ पिघलने का विज्ञान (Liquefaction): जैसे ही उत्तरायण काल में सूर्य की किरणें धीरे-धीरे तेज होने लगती हैं और वातावरण की उष्णता (गर्मी) बढ़ती है, सूर्य के इस तेज गर्मी के प्रभाव से के प्रभाव से हमारे मस्तिष्क (सिर) में स्थित कफ पिघलने लगता है।


कफ के पांच प्रकार: आयुर्वेद के अनुसार कफ पाँच प्रकार का होता है - तर्पक, बोधक, श्लेषक, अवलम्बक और क्लेदक। इनमें से मस्तिष्क में रहने वाला 'तर्पक कफ' सूर्य की गर्मी से पिघलकर लार के रूप में अत्यधिक मात्रा में बहता है।


लार का परीक्षण: वैद्य जी श्रोताओं को चुनौती देते हुए कहते हैं कि आप स्वयं इसका परीक्षण कर लें; पूरे वर्ष में इतनी लार कभी नहीं बनती जितनी वसंत ऋतु में बनती है।


मंदाग्नि और अजीर्ण: यह कफ-मिश्रित लार मुंह से होकर ग्रासनली के रास्ते आमाशय (Stomach) में पहुँचती है। वहाँ गिरकर यह जठराग्नि (पाचन अग्नि) को मंद कर देती है। जठराग्नि मंद होने से खाया हुआ भोजन पचता नहीं है और 'अजीर्ण' (अपच) की स्थिति बनती है।


अजीर्ण ही महाशत्रु है: आयुर्वेद का अचूक सिद्धांत है: 


"अजीर्णं सर्वरोगाणां कारणम्" (अर्थात, अजीर्ण ही संसार के सभी रोगों की मुख्य जड़ है)।


इसलिए वसंत ऋतु में हमारा सबसे पहला कर्तव्य जठराग्नि को प्रदीप्त करना (अग्नि बढ़ाना) और कफ को नष्ट करना होना चाहिए। जैसे सूर्य तालाबों का पानी सोख लेता है, वैसे ही प्रदीप्त अग्नि कफ को सुखा देती है।


४. वसंत ऋतुचर्या के कड़े नियम और व्यावहारिक विधियाँ


क) वमन, लंघन और कसरत (शोधन क्रियाएं)


कुपित कफ को शरीर से बाहर निकालने के लिए ग्रंथों में 'वमन' (औषधीय उल्टी), 'लंघन' (उपवास), 'प्रदान' (नस्य / नासिका मार्ग की शुद्धि), बार-बार कुल्ला करना (कवल धारण), उबटन लगाना, व्यायाम करना और हाथी, घोड़े या तेज वाहनों की सवारी करना हितकर बताया गया है।   

कहा जाता है छे ऋतु में वसंत को राजा कहा जाता है वसंत को राजा क्यों कहा जाता है यह प्रेमियों के लिए बहुत अच्छा रितु है यजुर्वेद में कहा गया है माघ के महीने में मैग्नी करनी है और और फागुन के अंत में विवाह करना है आप विवाह जब करते तो वहां पर प्रेम का प्रसंग शुरू हो जाता है  आप देखेंगे जब तक आपका विवाह नहीं होता तब तक आपके ऊपर  बहुत से कोई विश्वास नहीं करता है या कोई धनी बन गए या कोई फिल्म स्टार बन गई या फिर कोई अच्छा नाम कमा लिए कम करें परोपकार करें बिना तो लोग आपके ऊपर भरोसा करेंगे इसलिए विश्वास नहीं करते कि अभी वह छोटा बच्चा उसकी जीवन की रात का क्या अनुभव है इसलिए उसको संसार की कोई काल ज्ञान नहीं है महर्षि सुश्रुत जी एक बात बताते हैं महर्षि विश्वामित्र ने लिखा है 

पीले रंग का जो होता है उसे वसंत कहा जाता है आप देखेंगे चारों ओर संसार में बसंत के मौसम में चारों तरफ पीला पीला ही नजर आता है तो यह पीला पीला रंग दिखता है इसलिए इसको वसंत रितु कहा जाता है  

जो आती सुगंधित होता है उसे सुरभि कहा जाता है सभी पेड़ पौधों में नया-नया फूल आने लगेगा अभी-अभी मधुमक्खी भी नया सट्टा बनाएंगे जो पुराना छत्ता रहेगा उसे छोड़ देंगे इसलिए इसको बसंत नाम बसंत रखा गया है परंतु यह जोक कब हमारे पेट में हमारे शरीर में हमारे सर पर अगर भर जाएगा तो जो आनंद का या खुशी का अनुभव है वह नहीं मिलेगा हमें दिन में नहीं सोना है रात में हमें जागना नहीं है रात में जागने से दिन में सोने से हमारा कफ पड़ता है कसरत करने चाहिए बृहस्ती के पत्ते के पत्ते जिसे आक्रांति बोलते हैं वृहती  के पत्ते को सुखाकर संध्या के समय उसे जलाकर  नास्य नाक के द्वारा उसे शरीर में प्रवेश करना है हमारा जो काफ  सारा निकल जाएगा चंदन केसर कचनार विभिन्न प्रकार का जो गाय का गोबर भी मिल सकते हैं अष्टगंध जो होते हैं उसे भी मिल सकते हैं पूरे शरीर में  लेप लगाना है सूखने के बाद तब स्नान करना है सुबह के समय स्नान से लगभग 15:20 मिनट पहले जब सुख जाए तभी स्नान करना है वसंत ऋतु में जो का सेवन करना चाहिए रक्त धातु और उसके धातु पर अधिक प्रभाव पड़ता है रक्त धातु सुख धातु जब विद्युत होता तो पुरुषों में पर प्रमेह  रोग होता है  और स्त्री में रक्त प्रदर भी हो सकता है वसंत ऋतु में प्रमेय का बीज बोया जाता है इसीलिए आपको अधिक मात्रा में जो का सेवन करना है चावल कम खाना है गेहूं कम खाना है अधिक मात्रा में जो का सेवन करना है और जब भी पीना है तो गुनगुना पानी ही पीना है मल त्याग करके आए या मुट त्याग करके आए तो हल्का गुनगुना पानी पीना है यदि आप स्वस्थ होना रहना चाहते हैं तो वसंत ऋतु में दो क्रिया करना चाहिए एक शोधन 

शोध क्रिया क्या है शोध क्रिया की इसलिए आवश्यकता होती इसमें कब की मात्रा अधिक होतीहै आप देखेंगे इसमें सर्दी जुकाम खांसी नाक बहना नाक बंद विभिन्न प्रकार के अग्निमांड अजीर्ण अरुचि और सर्दी यह सब रोग अधिक मात्रा में पाई जाएगी  


ख) कफनाशक 'वमन' (उल्टी) का अचूक काढ़ा


सामग्री: मुलेठी का चूर्ण और पिप्पली (पीपल) का चूर्ण।


विधि: मुलेठी चूर्ण और पिप्पली चूर्ण को समान मात्रा में मिलाकर रखें। काढ़ा बनाने के लिए दो चम्मच मुलेठी चूर्ण और दो चम्मच पिप्पली चूर्ण को दो गिलास पानी में डालकर तब तक उबालें जब तक पानी उबलकर एक गिलास न रह जाए।


प्रयोग: इस काढ़े को किसी महीन सूती कपड़े से अच्छी तरह छान लें। जब यह थोड़ा गुनगुना (हल्का गर्म) रह जाए, तब इसे रोगी को पिला दें।


प्रभाव: इसे पीने के बाद एक बार वमन (उल्टी) होगी, जिससे छाती और सिर में जमा सारा कफ बाहर निकल जाएगा और शरीर में अद्भुत ताजगी व फुर्ती आएगी। वसंत ऋतु में  मूंग दाल का ही सेवन करना है केवल खिचड़ी बनानी है   घी कम मात्रा  मिलाये इसमें काली मिर्च त्रिकुटी का सेवन कर डाल सकते हैं 


समय-सीमा: वसंत ऋतु के पहले १५ दिनों तक इस प्रयोग को लगातार करें; उसके बाद पूरे दो महीने के शेष काल में सप्ताह में केवल एक बार करना भी पर्याप्त है।

इसके बाद ग्रीष्म ऋतु आने वाली है ग्रीष्म ऋतु में दिखेंगे धमालिया हो जाती है खुजली होने लगती है


ग) बहती (संक्रांति) के पत्तों का औषधीय धूम्रपान (Dhumpan)


सामग्री व विधि:  बृहति' (अक्रांति) के ताजे पत्ते ले आएं। ये २-३ दिन में सूख जाते हैं। इन सूखे पत्तों को बीड़ी या सिगरेट की तरह लपेटकर सुलगते अंगारे पर जला लें।


प्रयोग: प्रतिदिन शाम (संध्या) के समय इसके औषधीय धुएं को नाक से खींचकर साँस के द्वारा शरीर के अंदर प्रविष्ट कराएं।


लाभ: इससे सिर और नाक-कान-गले का रुका हुआ कफ तुरंत पिघलकर बाहर निकल जाता है।


घ) कफनाशक दिव्य उबटन (Ubtan / Udvartana)


सामग्री: चंदन, केसर, कचनार की छाल, अगर (Agarwood), जायफल, कपूर, अश्वगंधा चूर्ण और चने का आटा (बेसन)।


विधि: इन सभी दिव्य सुगंधित कफनाशक औषधियों को मिलाकर उबटन तैयार करें। सुबह स्नान करने से १५ से २० मिनट पहले पूरे शरीर पर इस लेप को रगड़कर लगाएं और सूखने के बाद स्नान करें।


ङ) गुनगुने पानी से स्नान का चमत्कारी रहस्य (Preventing Summer Ills)


वैद्य जी गुजरात और महाराष्ट्र के लोगों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वे १४ वर्ष गुजरात में रहे। वहाँ लोग दिवाली से होली तक तो गर्म पानी से नहाते हैं, लेकिन वसंत ऋतु आते ही सीधे ठंडे पानी से नहाना शुरू कर देते हैं, जो कि आयुर्वेद के विरुद्ध है।


नियम: वसंत ऋतु के पूरे २ महीनों तक हमेशा हल्के गुनगुने पानी से ही स्नान करना चाहिए।


चमत्कारी लाभ: यदि आप वसंत में गुनगुने पानी से नहाते हैं, तो आने वाली भीषण ग्रीष्म (गर्मी) ऋतु में आपको: 


कभी भी घमौरियां (Prickly heat) नहीं होंगी।


शरीर से अत्यधिक मात्रा में पसीना नहीं बहेगा।


पसीने से कभी भी दुर्गंध (Bad odor) नहीं आएगी।


शरीर अत्यधिक गर्मी या जलन से बचा रहेगा और किसी भी केमिकल समर पाउडर (जैसे डर्मीकूल) की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।


च) दक्षिण दिशा की यात्रा और कफवर्धक हवाओं का निषेध


कारण: वसंत ऋतु में दक्षिण दिशा से कफ बढ़ाने वाली और भारी हवाएं चलती हैं।


नियम: इसलिए इस ऋतु में दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके न बैठें और न ही इस दिशा में लंबी यात्राएं करें।


बचाव: यदि यात्रा करना बहुत जरूरी हो, तो हेलमेट पहनें या मुंह को कपड़े से ढँक लें ताकि दक्षिण की हवा सीधी सांस में न जाए। ट्रेन या बस में सफर करते समय दक्षिण दिशा की ओर अपनी पीठ करके बैठें。


छ) पेट की शुद्धि हेतु त्रिफला प्रयोग


प्रयोग:  त्रिफ़ला १०० gm और त्रिकटु१०० gm मिलाकर रखे प्रतिदिन रात को सोने से पहले १ चम्मच (लगभग ५ ग्राम) त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें। ध्यान रहे कि इसे भोजन के १ घंटे के बाद ही लेना है, भोजन के तुरंत बाद नहीं।


लाभ: कफ बढ़ने से पेट साफ नहीं होता और पाचन बिगड़ता है। यह त्रिफला प्रयोग पेट साफ रखेगा और आने वाले रोगों से बचाएगा। 


५. ऋतुराज वसंत का सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक विज्ञान


क) प्रेम, दांपत्य और विवाह का सही समय


ऋतुओं का राजा: छह ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण इसे 'ऋतुराज' कहा गया है।


प्रेम का ऋतु: महर्षि सुश्रुत और महर्षि विश्वामित्र के अनुसार इस ऋतु में प्रकृति चारों तरफ पीले रंग (वसंती आभा) से सज जाती है। इस ऋतु में 'मदन' (कामदेव), 'रति' और 'वसंत' का सह-वास होता है।


विवाह का ऋतु: आयुर्वेद के अनुसार माघ मास में दांपत्य संबंध स्थापित करने का निषेध है, बल्कि फाल्गुन के अंत में विवाह करना सर्वश्रेष्ठ है। विवाह होने के बाद ही जीवन में वास्तविक दांपत्य प्रेम और मदनोत्सव की शुरुआत होती है।


सामाजिक विश्वास का अनूठा उदाहरण: वैद्य जी हास्य-विनोद करते हुए कहते हैं कि समाज विवाहित पुरुषों पर अधिक भरोसा करता है। वे दीपक भैया और स्वयं का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वे विवाहित हैं, इसलिए समाज उनकी बातों पर विश्वास करता है, जबकि अविवाहितों को लोग दुनियादारी के अनुभव से हीन समझते हैं।


प्रकृति का नवजीवन: पतझड़ के बाद पेड़ों में नए पत्ते और सुगंधित फूल आते हैं। मधुमक्खियां पुराने छत्तों को छोड़ देती हैं और नए फूलों के पराग से शहद के नए छत्ते बनाती हैं।


ख) वसंत पंचमी का ऐतिहासिक व आध्यात्मिक रहस्य


चार शक्तियों का प्रकटीकरण: वसंत पंचमी के दिन केवल माता सरस्वती ही प्रकट नहीं हुई थीं, बल्कि सृष्टि में चार महाशक्तियां एक साथ प्रकट हुई थीं: वसंत (ऋतु), मदन (कामदेव), रति और माता सरस्वती। इसीलिए इस दिन को वसंत पंचमी या सरस्वती पंचमी कहा जाता है।


ग) आलस्य मुक्ति और फूलों की शैया


वसंत में कफ के कारण मन सुस्त, आलसी और निर्णय लेने में कमजोर हो जाता है। इससे बचने के लिए:


चंपा आदि सुगंधित फूलों से सुवासित वातावरण में रहें और रात को फूलों की शैया (बिस्तर पर फूल बिछाकर) पर सोएं। इससे मन प्रसन्न व चंचल रहता है और नकारात्मक विचार दूर रहते हैं।


कभी भी अकेले या एकांत में न रहें। मित्रों और बंधु-बांधवों के साथ हास्य-विनोद और सकारात्मक चर्चाएं करें।


घ) संध्या भ्रमण (Evening Walk) बनाम मॉर्निंग वॉक (84 रोगों की चेतावनी)


वैद्य जी आधुनिक डॉक्टरों द्वारा बताई जाने वाली 'मॉर्निंग वॉक' (सुबह टहलने) की प्रथा का पुरजोर विरोध करते हैं।


चेतावनी: किसी भी आयुर्वेद ग्रंथ में सुबह टहलने का कोई निर्देश नहीं है। सुबह की अत्यधिक ठंडी हवा में टहलने से शरीर का वात-कफ बिगड़ता है, जिससे शरीर में ८४ प्रकार के असाध्य रोग उत्पन्न होते हैं।


नियम: शास्त्रों में कहा गया है:


"वसंते भ्रमणं पथ्यं" (अर्थात, वसंत ऋतु में केवल शाम के समय घूमना ही पथ्यकारी है)।


सही समय और स्थान: दोपहर ३ से ५ बजे के बीच या शाम को सूर्य ढलने के समय टहलने जाएं। टहलने के लिए ऐसे स्थान चुनें जहाँ प्रचुर मात्रा में पेड़-पौधे और फूल खिले हों। नदी या तालाब के घाट पर बैठकर जल-जीवों (जैसे मछलियों आदि) और शांत बहते पानी को निहारें, जिससे मन को गहरी शांति मिलती है।


६. आँखों की सुरक्षा और दिव्य काजल (अंजन) बनाने की विधि


वसंत ऋतु में कफ पिघलकर आँखों की ज्योति को धीमा कर देता है, जिससे आँखों के सामने धुंधलापन या झिलमिलाहट (जैसे पुराने टीवी स्क्रीन पर आती थी) होने लगती है और आँख के रोग बढ़ते हैं।


नियम: कफ को आँखों से बाहर निकालने और आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए प्रतिदिन रात को सोते समय आँखों में अंजन (काजल) अवश्य लगाएं। इससे आँखों का कफ सुबह कीचड़ के रूप में बाहर निकल जाता है और आँखों की ज्योति बढ़ती है।


🕯️ घर पर शुद्ध कफनाशक काजल बनाने की विधि:


सामग्री: कांसे (Bronze) या तांबे (Copper) की थाली (स्टील या एल्युमिनियम की थाली का उपयोग बिल्कुल न करें), शुद्ध गाय का घी या तिल का तेल सरसों का तेल (Erand Oil), और शुद्ध भीमसेनी कपूर।


विधि: दीपक में गाय का घी या तिल का तेल डालें और उसमें थोड़ा कपूर मिला दें। इस दीपक को जलाएं। दीपक के दोनों ओर सहारा देकर तांबे या कांसे की थाली को उल्टा करके इस तरह रखें कि दीपक की लौ की कालिख (काली धुआं) थाली के पिछले हिस्से पर इकट्ठी होती रहे। बाद में इस कालिमा को खुरचकर निकाल लें और उसमें थोड़ा सा शुद्ध गाय का घी मिलाकर डिब्बी में भर लें। यह बाजार के रासायनिक काजलों से १०० गुना बेहतर और बेहद सस्ता (मात्र १० से ५० रुपये में तैयार) होता है।


⚠️ गर्भवती महिलाओं के लिए कड़ा निषेध:


गर्भवती महिलाओं को गर्भधारण के पहले महीने से लेकर शिशु के जन्म (प्रसव) होने के १० दिन बाद तक आँखों में काजल (अंजन) भूलकर भी नहीं लगाना चाहिए।


यदि गर्भवती स्त्री अंजन लगाती है, तो गर्भस्थ शिशु की आँखों की पुतली पर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं और बच्चे को जन्मजात 'अर्जुन रोग' (एक प्रकार का अंधापन/नेत्र रोग) हो जाता है।


७. आहार-विहार के नियम (क्या खाएं, क्या न खाएं)


क) जौ (Barley) का प्रचुर सेवन


वसंत ऋतु में चावल और नए गेहूं का सेवन कम करना चाहिए। इसके स्थान पर जौ (Barley/Yava) का प्रचुर सेवन करना चाहिए।


वैज्ञानिक कारण: वसंत ऋतु में बढ़ा हुआ कफ पुरुषों के 'शुक्र धातु' और स्त्रियों के 'रक्त धातु' को दूषित करता है। धातु दूषित होने से पुरुषों में प्रमेह (डायबिटीज/Urinary diseases) और स्त्रियों में प्रदर (Leukorrhea) रोग उत्पन्न होते हैं。 जौ का सेवन इन दोनों रोगों के बीजों को शरीर के भीतर ही नष्ट कर देता है।


ख) मूंग दाल और जौ की खिचड़ी


विधि: जौ और मूंग की दाल को मिलाकर खिचड़ी बनाएं। इस खिचड़ी में पर्याप्त मात्रा में घी डालें और अंत में पिप्पली चूर्ण (पीपल का पाउडर) या त्रिकटु चूर्ण (सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च का समान मिश्रण) मिलाकर खाएं।


ग) क्या खाएं (पथ्य आहार):


दिनभर केवल हल्का गुनगुना पानी ही पिएं। विशेषकर जब भी आप मलमूत्र का त्याग करके आएं, तो तुरंत आधा गिलास गुनगुना पानी अवश्य पिएं।


भोजन में कसैले, तीखे (कटु) और कड़वे रसों का सेवन करें ताकि कफ सूख सके।


अश्वगंधा चूर्ण का शहद या गुनगुने दूध के साथ सेवन करें क्योंकि यह कफ-नाशक और दीपन (अग्नि बढ़ाने वाला) है। 

अडूसा का भी सेवन कर सकते हैं जिससे वास कहते हैं


घ) क्या न खाएं (अपथ्य आहार - वर्जित सूची):


दही का पूर्ण निषेध: वसंत ऋतु में दही का सेवन जहर के समान वर्जित है क्योंकि यह शरीर में भारी मात्रा में कफ बढ़ाता है।


गरिष्ठ दालें: उड़द की दाल, अरहर (तुअर) की दाल और चने की दाल जैसी देर से पचने वाली चीजें बिल्कुल न खाएं।


वर्जित सब्जियां: मूली, कद्दू (पेठा), पका हुआ खीरा, ककड़ी, चौलाई, जिमीकंद (सूरन), करेले का फल (पत्ता दवा में ले सकते हैं पर फल नहीं खाना है), परवल और बैंगन खाने से बचें।


खट्टी, अत्यधिक मीठी और नमकीन चीजें बहुत कम खाएं।


दिन में सोना (दिवास्वप्न) और रात में जागना (रात्रि जागरण) पूरी तरह बंद रखें।


🥩 मांसाहार और अंडे का घातक परिणाम


इस ऋतु में जठराग्नि मंद होती है, इसलिए मांसाहार (मांस, मछली) और अंडे का सेवन बिल्कुल न करें।


जो लोग वसंत में अंडे और मांस खाते हैं, गर्मी आते ही उनका गला, मुंह और जीभ सूखने लगती है।


उन्हें ग्रीष्म ऋतु में भीषण लू (अंशुघात/Heat Stroke) लगती है और उनके पसीने से असहनीय दुर्गंध आती है।


८. विशिष्ट रोगों के अचूक आयुर्वेदिक उपचार (श्रोताओं के प्रश्नोत्तर)


प्रश्न १: वसंत ऋतु में बच्चों/बड़ों को चेचक (शीतला माता) हो जाए तो क्या करें?


उत्तर: वसंत में कफ कुपित होने से शीतला माता (चेचक/Chickenpox/Measles) का प्रकोप सबसे अधिक होता है। इसके लिए निम्नलिखित उपचार करें:


करेले के पत्तों का रस: करेले के ताजे पत्तों को कूटकर २ से ३ चम्मच रस निकालें। इसमें १ चम्मच शुद्ध शहद मिलाकर दिन में तीन बार (सुबह खाली पेट, दोपहर और शाम) ३ दिनों तक लगातार पिलाएं। इससे रोगी को पतले दस्त होंगे। दस्त होने से घबराएं नहीं, क्योंकि इससे शरीर के भीतर की सारी गर्मी और जलन दस्त के रास्ते बाहर निकल जाएगी और रोगी चैन की नींद सो सकेगा।


तुलसी के पत्ते: तुलसी के पत्तों को मुंह में रखकर धीरे-धीरे चूसने को कहें。


गोररचना चूर्ण: गोरचना बूटी का चूर्ण १ रत्ती शहद के साथ मिलाकर सुबह सूर्योदय से पहले और रात को भोजन के बाद चटाएं।


शीतलाष्टक स्तोत्र: भावप्रकाश ग्रंथ के उत्तराखंड में शीतला देवी को शांत करने के लिए शीतलाष्टक स्तोत्र के पाठ का विधान है。


आँखों की सुरक्षा (अंधापन रोकना): चेचक के दानों के कारण अक्सर बच्चों (विशेषकर लड़कियों) की आँखें फूट जाती हैं और वे हमेशा के लिए अंधी हो जाती हैं। इससे बचने का अचूक उपाय अष्टांग हृदय में वर्णित है: 


"एक साबुत हरड़ (Haritaki) लें, उसमें बारीक सुई से छेद करके पीले धागे में पिरो लें और इसे रोगी के गले में ताबीज की तरह बांध दें।" इसके दिव्य प्रभाव से चेचक के दाने आँखों तक नहीं फैलते और आँखें पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं।


प्रश्न २: साइटिका (गृध्रसी) का पुराना दर्द उठ गया है, पैर के नीचे तक दर्द जाता है, क्या करें? (आयु ७० वर्ष)


उत्तर: साइटिका के असहनीय दर्द के लिए निम्नलिखित उपचार लगातार १५ दिनों तक करें:


औषधि सेवन: 


वृहत वातचिंतामणि रस


महायोगराज गुग्गुल


सिंहनाद गुग्गुल


मात्रा: इन तीनों दवाओं में से २-२ गोली सुबह और शाम को भोजन के बाद गुनगुने पानी के साथ लें।


औषधीय तेल मालिश: 


महानारायण तेल और विषगर्भ तेल को बराबर मात्रा में मिला लें।


तेल गर्म करने का नियम: तेल को कभी भी सीधे चूल्हे की आग पर गर्म न करें, अन्यथा तेल के औषधीय गुण जल जाते हैं। एक बर्तन में पानी उबालें और उस उबलते पानी के भीतर तेल की कटोरी रखकर उसे गर्म करें। इस गुनगुने तेल से कमर से लेकर पैरों के नीचे तक हल्के हाथों से मालिश करें।


प्रश्न ३: गर्भावस्था के शुरुआती महीनों (ढाई महीने) में अत्यधिक सिरदर्द और उल्टियाँ होती हैं, क्या करें?


उत्तर: इसके लिए यह अचूक मिश्रण तैयार करें:


सामग्री: प्रवाल पिष्टी (१० ग्राम), मुक्ता पिष्टी (५ ग्राम) और मयूर चंद्रिका भस्म (१० ग्राम)।


विधि: तीनों को आपस में अच्छी तरह मिला लें और कुल २५ पुड़िया (बराबर खुराक) बना लें।


अनुपान (काढ़ा): १० पीस मुनक्का को १ गिलास पानी में उबालें। जब पानी आधा गिलास बचे, तो उसे छानकर मुनक्के का गुनगुना काढ़ा तैयार कर लें।


सेवन विधि: दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) एक-एक पुड़िया को   निगल ले इस गुनगुने मुनक्के के काढ़े के साथ सेवन करें। सिरदर्द और उल्टी एक से दो दिन में शांत हो जाएगी, पर इसका सेवन एक सप्ताह से १० दिनों तक जारी रखें।


प्रश्न ४: गर्भावस्था के दौरान आयरन (Iron) की कमी और ताकत के लिए तथा अंतिम महीनों में सुखद प्रसव (Normal Delivery) के लिए क्या दें?


उत्तर: इसके लिए निम्नलिखित आयुर्वेदिक औषधियां अत्यंत सुरक्षित हैं:


आयरन का विकल्प: बच्चे के स्वस्थ विकास और माँ में आयरन की कमी दूर करने के लिए आयुर्वेदिक औषधि 'प्रताप लंकेश्वर रस' (Pratap Lankeshwar Ras) का सेवन कराएं।


दशमूलारिष्ट: गर्भावस्था के अंतिम महीनों में भोजन के बाद ४ चम्मच दशमूलारिष्ट को बराबर मात्रा में गुनगुने पानी के साथ दिन में दो बार लें। यह गर्भाशय को ताकत देता है, प्रसव पीड़ा सहने की शक्ति देता है और बिना किसी कमजोरी के सामान्य प्रसव (Normal Delivery) सुनिश्चित करता है। इसके रहते किसी बाहरी विटामिन या सप्लीमेंट की आवश्यकता नहीं पड़ती।


ताकत के लिए सर्वश्रेष्ठ औषधियां: यदि आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो स्वर्ण युक्त वृहत गर्भचिंतामणि रस का सेवन कराएं, यह माँ और गर्भस्थ शिशु को अद्भुत बल प्रदान करता है। यदि सामर्थ्य कम हो, तो साधारण गर्भपाल रस का सेवन कराएं। इन्हें प्रसव के बाद भी लिया जा सकता है।


प्रश्न ५: चलने-बैठने पर घुटनों से 'कट-कट' की आवाज आती है, क्या करें?


उत्तर: घुटनों के ग्रीस/तरल को वापस लाने और कट-कट की आवाज बंद करने के लिए:


जानु बस्ती (Janu Basti): घुटने के ऊपर उड़द के आटे की घेरी बनाकर उसमें गुनगुना औषधीय तेल भरने की प्रक्रिया (जानु बस्ती) लगातार १६दिनों तक करवाएं।


औषधियां: अस्थिपोषक वटी (Asthiposhak Vati), लाक्षादि गुग्गुल और महायोगराज गुग्गुल।


मात्रा: इन तीनों की २-२ गोलियां दिन में दो बार (सुबह और रात को) गुनगुने दूध के साथ लें।


प्रश्न ६: गाड़ी से मोच (Sprain) आई थी, अब घुटने के पीछे दर्द और छोटी गांठ जैसी सूजन हो गई है, क्या करें?


उत्तर: मोच और सूजन को जड़ से समाप्त करने के लिए यह चमत्कारी लेप लगाएं:


लेप सामग्री: हल्दी पाउडर (१ चम्मच), खाने वाला मीठा सोडा (१ चम्मच), खाने वाला चूना जो पान में लगाया जाता है (आधा चम्मच), और शुद्ध शहद (२ से ३ चम्मच)।


विधि: इन सभी को आपस में मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट (मलहम जैसा) बना लें। दर्द और सूजन वाले स्थान पर इसका लेप लगाएं।


प्रयोग नियम: लेप लगाने के बाद लगभग ५घंटे के लिए छोड़ दें जब तक कि वह पूरी तरह सूख न जाए। सूखने के बाद इसे ठंडे (शीतल) जल की धार से धोकर साफ करें। इसे दिन में दो बार (दोपहर और रात) करें।


आंतरिक औषधि: साथ में महायोगराज गुग्गुल की २-२ गोलियां दिन में दो बार भोजन के बाद गुनगुने दूध के साथ सेवन करें।ऊपर बताया गया है


प्रश्न ७: छत से गिरने के कारण रीढ़ की हड्डी (Spine) में खिंचाव और पुराना अकड़न भरा दर्द है, क्या करें?


उत्तर: रीढ़ की हड्डी के पुराने दर्द और अकड़न को दूर करने के लिए निम्नलिखित नुस्खा अपनाएं:


औषधियां: वृहत वातचिंतामणि रस, महायोगराज गुग्गुल और वातहरि विध्वंसन रस।


सेवन विधि: इन तीनों औषधियों को मिलाकर दिन में दो बार शहद के साथ ३ महीने तक लगातार चाटें। साथ में पीठ पर महानारायण तेल की हल्की मालिश करें। इससे रीढ़ का पुराना दर्द और खिंचाव हमेशा के लिए दूर हो जाएगाu


"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥" "ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ हरि ॐ श्री गुरुभ्यो नमः॥"


इसके साथ ही यह अद्भुत स्वास्थ्य ज्ञान सत्र संपूर्ण होता है।



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