6.आयुर्वेद विषय पर आलोचना सत्र
वैद्यमित्र श्री सत्यवान नायक जी का आयुर्वेद आलोचना सत्र 6
स्वस्थ समृद्ध परिवार अभियान के अंतर्गत वैद्यमित्र श्री सत्यवान नायक जी द्वारा दिया गया यह आलोचना सत्र भगवान धन्वन्तरि के स्मरण और प्रणाम से आरंभ होता है। व्याख्यान में दिए गए प्रत्येक प्रसंग, सिद्धांत और उदाहरण का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
१. शरीर और रोगों का संबंध
शरीरं व्याधिमन्दिरम्: आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर रोगों का घर या मंदिर है। हमने इस शरीर को केवल किराए पर ले रखा है या गिरवी रखा है। जीवन में इसे १६ बार संस्कारित (रिमाइंड) करना होता है, जिसे १६ संस्कार कहते हैं।
उदाहरण १ (किराए का मकान और मकान मालिक): जिस प्रकार यदि आप कोई दुकान या घर किराए पर लेते हैं और मकान मालिक क्रोधित हो जाए, तो वह डांटता है, बहस करता है या घर से निकाल देता है; ठीक उसी प्रकार जब शरीर में वात, पित्त और कफ दोष कुपित होकर क्रोधित हो जाते हैं, तो वे रुष्ट होकर शरीर और मन को पीड़ा देने लगते हैं।
२. रोगों के मुख्य तीन कारण
चरक संहिता के अनुसार रोगों के उत्पत्ति के मुख्य ३ कारण हैं:
- असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग (इंद्रियों का उनके विषयों के साथ असंतुलित/अहितकर संबंध)
- प्रज्ञापराध (बुद्धि व विवेक का अपराध)
- परिणाम (काल/समय का प्रभाव)
हमारे शरीर में १० इंद्रियां हैं (५ ज्ञानेंद्रियां और ५ कर्मेंद्रियां)। जब इंद्रियों का उनके विषयों के साथ सात्म्य (संतुलित) संयोग होता है, तब मनुष्य निरोग रहता है। परंतु जब असात्म्य (असंतुलित) संयोग होता है, तो रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रत्येक इंद्रिय के संदर्भ में यह असात्म्य संयोग ३ प्रकार का होता है:
- अति योग: क्षमता से अत्यधिक प्रयोग करना।
- हीन योग (अयोग): बहुत कम प्रयोग करना या बिल्कुल प्रयोग न करना।
- मिथ्या योग: विपरीत, गलत या अनुचित तरीके से प्रयोग करना।
३. प्रथम ज्ञानेंद्रिय — चक्षु (आंख)
आंख सबसे महत्वपूर्ण इंद्रिय है क्योंकि इसके बिना संसार के किसी भी विषय का उपभोग या आनंद नहीं लिया जा सकता। देखने की क्रिया के पीछे 'आलोचक पित्त' (एक प्रकार की ज्योति) कार्य करता है, जो दोनों आंखों के बीच स्थित रहकर देखने की शक्ति प्रदान करता है।
उदाहरण २ (अंधेरा और बिजली जाना): रात में यदि घर की बिजली चली जाए, तो आपको अपने घर के सामान (टीवी, फ्रिज, कपड़े, किताबें) की जगह पता होने के बावजूद आप उन्हें देख या उठा नहीं पाते, क्योंकि देखने के लिए माध्यम रूपी प्रकाश (आलोक) आवश्यक होता है।
(क) आंख का अति योग:
उदाहरण ३ (दोपहर का कड़क सूर्य): अपनी आंखों की क्षमता से अधिक तीव्र प्रकाश को एकटक देखना। यदि दोपहर के कड़क सूर्य को बिना पलक झपकाए ५ मिनट तक देखा जाए, तो आलोचक पित्त पर प्रहार होता है और चारों तरफ केवल उजाला ही उजाला दिखता है।
उदाहरण ४ (दुबला मनुष्य बनाम पहलवान): जैसे कोई दुबला-पतला व्यक्ति किसी बड़े पहलवान या वीर योद्धा को युद्ध के लिए ललकारे, तो उसकी जो दुर्दशा होगी और उसे मार खानी पड़ेगी; ठीक वैसा ही प्रहार आलोचक पित्त पर होता है जब अत्यधिक तीव्र प्रकाश आंखों पर पड़ता है।
उदाहरण ५ (हैलोजन व उच्च पावर के बल्ब): हैलोजन लाइट या १०० वाट/९० वाट के बिजली के बल्बों को एकटक घूरना। इससे वात-पित्त-कफ दोष कुपित होकर नेत्र रोग उत्पन्न करते हैं।
(ख) आंख का हीन योग (अयोग):
उदाहरण ६ (हिमालय की कंदरा / कालकोठरी): यदि कोई व्यक्ति हिमालय की गुफाओं या जमीन के नीचे ऐसी कालकोठरी में रहे जहाँ सूर्य, चंद्रमा या दिए का प्रकाश बिल्कुल न पहुँचे। यदि वह महीनों या वर्षों वहाँ रहे, तो उसकी दृष्टि शक्ति क्षीण हो जाएगी। बाहर आने पर मोमबत्ती या दीये की हल्की रोशनी से भी आंखों में मिर्च जैसी जलन (नेत्रदाह) होगी।
उदाहरण ७ (पौराणिक कथा — च्यवन ऋषि और सुकन्या):
च्यवन ऋषि तपस्या में लीन थे और उन पर दीमक की मिट्टी (बांबी) जम गई थी। राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने बांबी के दो छिद्रों से चमक निकलती देखी और कौतूहलवश दो कांटे उसमें डाल दिए, जिससे ऋषि की दोनों आंखें फूट गईं।
ऋषि के रुष्ट होने पर राजमहल में सभी का मल-मूत्र रुक गया। राजा शर्याति ने सुकन्या का विवाह वृद्ध व अंधे च्यवन ऋषि से करा दिया।
बाद में देव-वैद्य अश्विनी कुमार आए। च्यवन ऋषि ने उन्हें यज्ञ में सोम-आहुति का अधिकार दिलाने का वचन दिया और बदले में अश्विनी कुमारों ने दिव्य औषधि (च्यवनप्राश) से ऋषि की आंखों की दृष्टि लौटा दी व उन्हें पुनः युवा बना दिया।
जब इंद्र ने क्रोधित होकर वज्र चलाया, तो च्यवन ऋषि ने इंद्र का हाथ बाहुस्तंभ (महावात) से जड़ कर दिया था।
(ग) आंख का मिथ्या योग:
उदाहरण ८ (अत्यधिक दूरी या अत्यंत निकटता से देखना): बहुत दूर की वस्तु को घूरकर देखना, या अपनी उंगलियों/वस्तु को आंख के बिल्कुल करीब लाकर देखना। ऐसा करने पर चक्कर आने लगते हैं और माथे (आज्ञा चक्र) में दर्द होने लगता है।
उदाहरण ९ (हॉरर फिल्में व हिंसक दृश्य): डरावनी/भयानक फिल्में देखना, हत्या, मारकाट या बलात्कार के दृश्य देखना। इससे हृदय दुर्बल होता है और स्नायुमंडल (nervous system) पर गहरा कुप्रभाव पड़ता है।
उदाहरण १० (इंद्रजाल / जादूगरी देखना): जादूगरों के असत्य या अनहोनी करतब देखना (जैसे पत्थर पानी में तैरना, या कटे मनुष्य को जोड़ना)। इसे शास्त्रों में 'इंद्रजाल' कहा गया है, जो मन और हृदय पर गलत प्रभाव डालता है।
उदाहरण ११ (अशास्त्रोक्त त्राटक करना): शास्त्रों (घेरण्ड संहिता आदि) में त्राटक का नियम नासिकाग्र, १ हाथ दूरी पर पीले निशान, या चंद्रमा पर करने का है। परंतु गलत तरीकों से त्राटक करने से आलोचक पित्त व मस्तिष्क प्रभावित होता है।
४. द्वितीय ज्ञानेंद्रिय — श्रोत्र (कान)
कान का मुख्य कार्य सुनना है।
(क) कान का अति योग:
उदाहरण १२ (लगातार इयरफोन/ब्लूटूथ का प्रयोग): दिनभर इयरफोन या ब्लूटूथ लगाकर तेज आवाज में गाने सुनना, या यूट्यूब पर २४ घंटे चलने वाले गायत्री मंत्र/महामृत्युंजय मंत्र आदि बजाते रहना।
उदाहरण १३ (गाली-गलौज व निंदा सुनना): शराबी का चिल्लाना, गाली-गलौज, चीख-पुकार या किसी की निरंतर निंदा सुनना।
उदाहरण १४ (ढोल-नगाड़े व वीर वाद्य का अति-श्रवण):
ढोल, नगाड़े, भेरी जैसे गंभीर वाद्य केवल तब हितकर हैं जब स्नायुमंडल कमजोर हो, मन में निराशा हो या युद्ध में उत्साह जगाना हो। (पौराणिक प्रसंग: महिषासुर वध के समय देवी दुर्गा को जोश में लाने के लिए देवताओं ने ढोल बजाए थे; तथा नेटवर्क मार्केटिंग बैठकों में उत्साह जगाने हेतु इसका प्रयोग होता है)।
परंतु प्रतिदिन ढोल-नगाड़ों की प्रचंड ध्वनि सुनना कान का अति योग है। इससे मूर्च्छा, अपस्मार (मिर्गी) और संन्यास (कोमा) जैसे गंभीर रोग हो सकते हैं।
इसके विपरीत, मृदंग व झंझार के साथ सात्त्विक संकीर्तन (जैसे 'हरे कृष्ण' महामंत्र) सात्त्विक भक्ति भाव जगाता है।
(ख) कान का हीन योग (अयोग):
पूर्ण निःशब्द वातावरण में रहना: ऐसे स्थान पर रहना जहाँ हवा की झंकार या अपनी सांस की आवाज भी न सुनाई दे। यदि कोई वर्षों ऐसे वातावरण में रहे और अचानक बाहर आए, तो हल्की हवा चलने पर भी कान के पर्दे फटने जैसा महसूस होगा और सिरोवेष्टन / ब्रेन हैमरेज होकर मृत्यु हो सकती है।
(ग) कान का मिथ्या योग:
उदाहरण १५ (प्रतिदिन अपमान व गालियाँ सुनना): ऐसे स्थान या मालिक के पास काम करना जहाँ रोज गालियाँ या अपमान सुनने को मिले।
उदाहरण १६ (अशुभ/मृत्यु के समाचार सुनना): कोरोना काल की तरह निरंतर "आज वह मर गया, कल वह मर गया" जैसे समाचार सुनना।
उदाहरण १७ (रामायण/हनुमन्नाटक का प्रसंग — चार संकट): श्री राम जी को एक साथ चार संकटपूर्ण समाचार मिले थे — देश निकाला, पिता का देहांत, सीता का अपहरण, और लक्ष्मण को शक्ति बाण लगना। ऐसे समाचारों से मन व हृदय पर भयंकर आघात लगता है।
उदाहरण १८ (अचानक भयंकर शब्द/विस्फोट): अचानक बम धमाका होना, गोली चलना, भूकंप, मकान गिरना या हॉरर फिल्मों में अचानक चीखने की आवाज सुनना।
५. अन्य इंद्रियों का विवरण (नाक, जीभ, त्वचा, हाथ व पैर)
वाक् (मुख/वाणी): अत्यधिक बोलना अति योग है; मौन रहना हीन योग है; और निंदा, चापलूसी, असत्य व उपहास बोलना मिथ्या योग है।
हस्त (हाथ): निरंतर काम करना अति योग; निष्क्रिय पड़े रहना हीन योग; और गलत कार्य करना मिथ्या योग है।
पाद (पैर - चलना):
अति योग: दिन-रात लगातार चलते रहना।
हीन योग: बिल्कुल न चलना (केवल गाड़ियाँ/लिफ्ट प्रयोग करना)। इससे लिवर, किडनी, स्प्लीन, पैंक्रियाज खराब होते हैं तथा गैस्ट्रिक, अल्सर, डायबिटीज, बीपी जैसे रोग होते हैं।
मिथ्या योग: गलत व कष्टकारी सतहों (कांच, गड्ढों, कांटों, पत्थरों) पर चलना।
उदाहरण १९ (कंकड़/गिट्टी पर चलने वाले व्यक्ति का केस इतिहास):
एक व्यक्ति ने एक्यूप्रेशर के नाम पर घर में छोटे पत्थर (गिट्टी) बिछा दिए और रोज आधा-एक घंटा उन पर चलने लगा।
पहले दर्द हुआ, फिर पैर सुन्न हो गए। धीरे-धीरे स्नायुमंडल दुर्बल हो गया, बीपी लो हो गया, चक्कर आने लगे और आंखों के आगे अंधेरा छा गया।
अंततः वह चलने में असमर्थ होकर भुवनेश्वर के सम अस्पताल (SUM Hospital) में भर्ती हुआ, जहाँ १० लाख रुपये खर्च हुए। जब गिट्टी पर चलना बंद हुआ, तब जाकर १५ दिनों में सुधार हुआ।
सही एक्यूप्रेशर — दूर्वा (दूब) घास पर चलना व दूर्वा रस:
गिट्टी के बजाय सुबह दूर्वा घास पर नंगे पांव ३० मिनट चलना चाहिए।
उदाहरण २० (महर्षि दुर्वासा का प्रसंग): महर्षि दुर्वासा (रुद्रावतार) अत्यधिक क्रोधी थे। माता-पिता के कहने पर उन्होंने "ॐ नमो भगवते रुद्राय" मंत्र का जप करते हुए १२ वर्षों तक दूर्वा घास का सेवन किया, जिससे उनका तमोगुण व क्रोध शांत हो गया।
दूर्वा रस के लाभ: यह तमोगुण व रजोगुण को शांत करता है। सत्वगुण बढ़ाता है। शरीर की गर्माहट, बढ़ा हुआ पित्त, महिलाओं में अत्यधिक रक्तस्राव (हेवी ब्लीडिंग), गर्भाशय व हृदय रोगों को दूर करता है। सूर्योदय से पूर्व ४ चम्मच दूर्वा रस १ कप पानी में लेना चाहिए।
६. प्रश्नोत्तरी सत्र (चिकित्सा व समाधान)
मामला १ (४० वर्ष से डायबिटीज पीड़ित महिला के पैर सुन्न/गादी जैसे लगना व कमजोरी):
औषधि: वसंत कुसुमाकर रस (२ गोली) + चंद्रप्रभा वटी (२ गोली) खाली पेट दूध के साथ दिन में २ बार।
चूर्ण योग: अश्वगंधा (१०० ग्राम) + आंवला (१०० ग्राम) + अर्जुन छाल (१०० ग्राम) + मेथी दाना (१०० ग्राम) मिलाकर भोजन के ३० मिनट बाद १ चम्मच गुनगुने पानी से।
मामला २ (१९ वर्ष के युवा को मोतियाबिंद/कैटरेक्ट):
उपचार: त्रिफला चूर्ण (१ चम्मच) को रात में कांच के गिलास में पानी में भिगोकर, सुबह ३ परत वाले कपड़े से छानकर उससे आंखों पर छींटे मारना।
आंख में डालना: पतंजलि दृष्टि आई ड्रॉप (शहद, नींबू रस, प्याज रस, अदरक रस युक्त)।
आंतरिक सेवन: सप्तामृत लौह (२ गोली) को १ चम्मच महात्रिफला घृत और आधा चम्मच शहद के साथ सुबह खाली पेट दीर्घकाल तक लेना।
मामला ३ (२८ वर्ष के युवक को उन्माद/२४ घंटे लगातार बोलते रहने की समस्या):
औषधि: मानस मित्र वटी (या मानस मित्र वटकम्) २-२ गोली।
विशेष नियम: यह औषधि केवल सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद (रात्रि में/चंद्र-काल में) दूध या शहद के साथ दी जानी चाहिए, क्योंकि मन-मस्तिष्क का कारक चंद्रमा है। इसे १ वर्ष तक नियमित देना चाहिए।

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