4 आयुर्वेद विषय पर आलोचना सत्र



१. सत्रारंभ एवं मंगलाचरण

सत्र का शुभारंभ निम्नलिखित वैदिक मंत्र के ध्यान से हुआ:

"ॐ यो भूतंच भव्यंच सर्वं यश्चाधितिष्ठति। स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥"

वैद्य जी ने आयुर्वेद के जनक भगवान श्री धन्वंतरी जी को प्रणाम करते हुए एवं मानव कल्याण की भावना के साथ अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाया।

२. आयुर्वेद में 'द्रव्य' की परिभाषा एवं ९ सार्वभौमिक द्रव्य

आयुर्वेद के अनुसार द्रव्य की परिभाषा दी गई है:

  • द्रव्य की परिभाषा: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण का नित्य (समवाय) संबंध होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि आज उसमें कोई गुण या कर्म है और कल नष्ट हो जाए; कर्म और गुण परस्पर सदैव जुड़े रहते हैं।

  • ९ सार्वभौमिक द्रव्य: संपूर्ण सृष्टि में ऐसे केवल ९ द्रव्य पाए जाते हैं:

    1. आकाश (पंचमहाभूत)
    2. वायु (पंचमहाभूत)
    3. अग्नि (पंचमहाभूत)
    4. जल (पंचमहाभूत)
    5. पृथ्वी (पंचमहाभूत)
    6. आत्मा
    7. मन
    8. काल (समय/अवस्था)
    9. दिशा
  • द्रव्यों की नित्यता:

    • पंचमहाभूत: ये नित्य कारण रूप में विद्यमान रहते हैं।
    • आत्मा: आत्मा अजर-अमर है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती। जब तक आत्मा शरीर में वास करती है, तब तक जीवन के लक्षण दिखते हैं; आत्मा के निकलते ही शरीर मृतक (शून्य) हो जाता है।
    • मन: गर्भाधान संस्कार से लेकर मृत्यु तक मन की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
    • काल: समय या अवस्था भी नित्य संबंध रखती है।
    • दिशा: दसों दिशाओं के अपने कर्म और गुण नित्य हैं। उदाहरण के लिए, भगवान सूर्य सदैव पूर्व दिशा में उदित होते हैं और पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं। उत्तर दिशा में सप्तर्षि नक्षत्र और दक्षिण दिशा में अगस्त्य ऋषि नक्षत्र विराजमान रहते हैं। सनातन धर्म में वास्तु शास्त्र इन्हीं दिशाओं के सिद्धांतों पर निर्भर करता है।

३. त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) द्वारा ९ द्रव्यों के दूषित होने का विस्तृत विवरण

आयुर्वेद (आचार्य चरक) के अनुसार ये ९ द्रव्य केवल वात, पित्त और कफ के प्रभाव से ही दूषित/प्रभावित होते हैं। प्रत्येक द्रव्य पर त्रिदोषों के प्रभाव को उदाहरणों सहित समझाया गया:

(क) आकाश महाभूत पर त्रिदोष का प्रभाव:

  • वात के कारण: जब तेज हवा चलती है, तो वह मेघ-मालाओं (बादलों) को उड़ाकर लाती है और आकाश में सूर्य, चंद्र, नक्षत्र सब ढक जाते हैं तथा केवल बादल ही दिखाई देते हैं।
  • पित्त के कारण: जब भीषण दावानल (जंगल की आग), पेट्रोल पंप विस्फोट या अत्यधिक गर्मी होती है, तो उठने वाले घने काले धुएँ और ताप से पूरा आकाश ढक जाता है और दिखाई नहीं देता।
  • कफ के कारण: वर्षा ऋतु में (जो जल/कफ का समय है) सामान्यतः नीला दिखने वाला आकाश काले या लाल रंग के बादलों से ढक जाता है।

(ख) वायु महाभूत पर त्रिदोष का प्रभाव:

  • वात के कारण: हेमंत या शिशिर (सर्दी के मौसम) में यदि कोई पंखा, एसी या कूलर चलाता है, तो शरीर में वायु कुपित हो जाती है, जिससे जोड़ों में दर्द, कमर दर्द, एड़ी दर्द, सिरदर्द और गठिया (अर्थराइटिस) जैसे वात रोग उत्पन्न होते हैं।
  • पित्त के कारण: ग्रीष्म ऋतु में दोपहर के समय सूर्य की तीव्र किरणों से जब गर्म हवा (लू) चलती है, तो व्यक्ति स्वेटर या जैकेट नहीं पहन सकता; गर्म हवा के कारण पसीना निकलता है और बेचैनी होती है।
  • कफ के कारण: वर्षा ऋतु में (जो कफ/जल प्रधान है) जब वर्षा के साथ हवा चलती है, तो शरीर में ठिठुरन और ठंडक महसूस होती है।

(ग) आत्मा पर त्रिदोष का प्रभाव:

  • वात के कारण: जब कोई साधक ध्यान, प्राणायाम या मुद्राभ्यास में बैठता है, तब यदि तेज हवा चले या डीजे, मोबाइल, टीवी का तेज शब्द (जो आकाश/वायु का गुण है) कानों में पड़े, तो एकाग्रता भंग हो जाती है और आत्माभ्यास में बाधा आती है।
  • पित्त के कारण: ध्यान के समय यदि बिजली चली जाए, पंखा बंद हो जाए या अत्यधिक गर्मी से शरीर से पसीना निकलने लगे (जो पित्त का लक्षण है), तो मन चंचल हो जाता है और ध्यान भंग हो जाता है।
  • कफ के कारण: जब व्यक्ति को सर्दी, खांसी या जुकाम (कफ विकृति) होता है, तो पतंजलि योग सूत्र एवं महर्षि चरक के अनुसार इंद्रियाँ प्रभावित होती हैं, जिससे ध्यान या प्राणायाम नहीं हो पाता।

(घ) मन पर त्रिदोष का प्रभाव:

  • पित्त के कारण: मन में क्रोध, हिंसा, ईर्ष्या और जलन का भाव उत्पन्न होता है (जैसे—"वह अधिक अमीर क्यों है, उसकी पत्नी/संतान अधिक सुंदर या सफल क्यों है")।
  • कफ के कारण: मन में आलस्य, अवहेलना, टालमटोल की प्रवृत्ति आती है (जैसे—भोजन या कार्य के लिए बुलाने पर 'थोड़ी देर बाद करेंगे' कहना, ५ मिनट के काम को आधे घंटे में करना)।

(ङ) काल (आयु की अवस्थाओं) पर त्रिदोष का प्रभाव:

मनुष्य की तीन मुख्य अवस्थाएँ होती हैं:

  1. बाल्यावस्था (कफ प्रधान): बच्चे में कफ के कारण मंद बुद्धि, सर्दी-जुकाम और नादानी में गलतियाँ होती हैं, जिससे माता-पिता व गुरुजनों से डांट/मार पड़ती है।
  2. युवावस्था (पित्त प्रधान): युवावस्था में पित्त अहंकार का रूप ले लेता है। युवा सोचता है कि "मैं जो जानता हूँ, वही सत्य है; मुझे किसी की सलाह की आवश्यकता नहीं है"।
    • ८४ अंगुल का सिद्धांत (वैद्य मनोरमा ग्रंथ के अनुसार): चाहे बालक हो या वयस्क, हर मनुष्य के अपने हाथ की उँगलियों के नाप से सिर से लेकर पैर के तलवे तक की लंबाई ८४ अंगुल (84 Angul) होती है। युवावस्था में व्यक्ति सोचता है कि "मैं तो पूरा ८४ अंगुल का हो गया हूँ, मुझे किसी से परामर्श क्यों लेना?"—यह भाव पित्तजन्य अहंकार का सूचक है।
  3. वृद्धावस्था (वात प्रधान): वृद्धावस्था में शरीर दुर्बल हो जाता है, दृष्टि व श्रवण शक्ति क्षीण हो जाती है, पाचन मंद हो जाता है, ३६० संधियों (जोड़ों) में दर्द होता है और रात में नींद नहीं आती (उल्लू की तरह जागना), जिससे व्यक्ति का मान-बल घट जाता है।

(च) दिशा पर त्रिदोष का प्रभाव:

  • वात के कारण: घने जंगल या अनजान स्थान पर जब हवा काले बादलों को घेर लाती है, तो पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण दिशा का ज्ञान होना असंभव हो जाता है।
  • पित्त के कारण: दोपहर में जब सूर्य ठीक मस्तक के ऊपर होते हैं या भीषण अग्नि का प्रकोप होता है, तब दिशा का सही भान नहीं हो पाता।
  • कफ के कारण: यदि कोई व्यक्ति तालाब, नदी या समुद्र के जल के भीतर प्रवेश कर जाए, तो जल (कफ) के अंदर दिशाओं का ज्ञान समाप्त हो जाता है।

४. दोष, दूष्य एवं दृष्टि की परिभाषा

चरक संहिता के अनुसार:

  • दोष: जो दूसरों को दूषित करते हैं, उन्हें दोष (वात, पित्त, कफ) कहते हैं।
  • दूष्य: जो दूषित होते हैं (जैसे धातुएँ व द्रव्य), उन्हें दूष्य कहते हैं।
  • दृष्टि: दूषित होने पर जो लक्षण सामने दिखाई देते हैं, उन्हें दृष्टि कहा जाता है।

५. मानसिक त्रिगुण सिद्धांत (सत्त्व, रज, तम)

शरीर के तीन दोष (वात, पित्त, कफ) होते हैं, उसी प्रकार मन के तीन गुण—सत्त्व, रज और तम होते हैं। आयुर्वेद में इन्हें 'गुण' इसलिए कहा गया है क्योंकि ये गुणात्मक वृद्धि (Multiplication) करते हैं।

त्रिवर्ग और त्रिगुण का संबंध:

संसार में धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) छत एवं दीवारों के समान हैं, जबकि सत्त्व, रज और तम उनकी नींव/पिलर हैं।

तीनों गुणों के लक्षण एवं व्यवहार:

  1. सत्त्वगुण: यह सदैव शुद्ध रहता है। सत्त्वगुण के प्रभाव से व्यक्ति मंदिर जाता है, मंत्र जप, प्राणायाम, वेद-शास्त्र का अध्ययन, दान (कंबल, रोटी, भोजन), गोसेवा, माता-पिता व गुरुजनों की सेवा तथा राष्ट्रहित के कार्य करता है।
  2. रजोगुण: रजोगुण से प्रभावित व्यक्ति केवल अपने सीमित परिवार (पत्नी, बच्चे, उनकी पढ़ाई, नौकरी, मकान) तक ही सोचता है; वह समाज, देश या दूसरों के बारे में नहीं सोचता। ऐसे लोग बहुधा द्वि-अर्थी (Double meaning) बातें करते हैं।
  3. तमोगुण: तमोगुण के प्रभाव से मन में अहंकार, पाप, ठगी, व्यभिचार, चोरी, झूठ, गाली-गलौज, हिंसा और दूसरों को फंसाने के विचार आते हैं।

गुणों का परिवर्तन एवं स्थिति नियम (१ कदम ऊपर या नीचे):

  • सत्त्व से ऊपर की स्थिति को 'स्थितप्रज्ञ' तथा तम से नीचे की स्थिति को 'अंत्यज' कहा गया है।
  • व्यक्ति अपनी संगति के आधार पर केवल एक चरण ऊपर या एक चरण नीचे जा सकता है:
    • सत्त्वगुणी व्यक्ति कुसंगति से रजोगुण में आ सकता है।
    • रजोगुणी व्यक्ति सत्संग से सत्त्वगुण में उठ सकता है या कुसंग से तमोगुण में गिर सकता है।

गर्भाधान संस्कार का महत्व एवं तमोगुणी संतान के कारण:

आचार्यों के अनुसार मदिरापान, मांस सेवन, क्रोध के आवेश या बलात्कार से ठहरे गर्भ से तमोगुणी संतान उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त अमावस्या, प्रतिपदा, एकादशी, संक्रांति, ग्रहण काल तथा पुरुषोत्तम मास (मलमास/अधिक मास) में गर्भाधान करने से तमोगुणी संतानें उत्पन्न होती हैं।

अजामिल का पौराणिक एवं आयुर्वेदिक उदाहरण:

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार अजामिल का जन्म रजोगुण (ब्राह्मण कुल) में हुआ था। परंतु वेश्या की संगति से वह तमोगुण में गिर गया और मद्य-मांस सेवन व कुकर्म करने लगा। अंत समय में ऋषियों की सलाह से अपने पुत्र का नाम 'नारायण' रखने के कारण, मृत्यु के समय 'नारायण' पुकारने पर उसे सत्त्वगुण की प्राप्ति हुई और विष्णुदूत उसे वैकुंठ ले गए।

त्रिगुण, लोक एवं शरीर का विभाजन:

  • सत्त्वगुण देवताओं में, रजोगुण मनुष्यों में और तमोगुण असुरों में पाया जाता है।
  • शरीर में तीन लोक:
    1. सिर से हृदय तक = स्वर्गलोक (कफ का स्थान)
    2. हृदय से नाभि तक = मृत्युलोक (पित्त का स्थान)
    3. नाभि से पैर के अंगूठे तक = पाताललोक (वात का स्थान)

६. प्रश्नोत्तरी एवं शंका समाधान (सत्र का अंतिम भाग)

  1. संगति से गुणों में परिवर्तन:

    • प्रश्न: क्या अच्छी संगति से तम/रज से सत्त्वगुण में परिवर्तन संभव है?
    • उत्तर: जी हाँ, अच्छी संगति और सत्संग से गुणों में पूर्ण परिवर्तन किया जा सकता है।
  2. सूजन व मूत्र विकार:

    • उपाय: पुनर्नवा के ताजे पत्तों का रस/काढ़ा अथवा आरोग्यवर्धिनी वटी (२ गोली) + पुनर्नवादि मंडूर (२ गोली) + पुनर्नवारिष्ट (४ चम्मच) को एक कप पानी में मिलाकर भोजन के बाद सुबह-शाम लें।
  3. मुख सूखना व स्त्री रोग (कमर दर्द/माहवारी समस्या):

    • उपाय: रात को सोने से पहले १ गिलास गुनगुने दूध में १ चम्मच देशी गाय का घी मिलाकर पिएं तथा सुबह खाली पेट ४ चम्मच आँवले का रस १ कप पानी में मिलाकर लें।
  4. ६ महीने के शिशु का आहार:

    • उपाय: ६-७ महीने के शिशु का अन्नप्राशन संस्कार करके बासमती चावल की दूध-ड्राई फ्रूट्स वाली खीर देना प्रारंभ करें।
  5. पैर के पंजे में अकड़न व कोलेस्ट्रॉल/थायरॉइड:

    • उपाय: आरोग्यवर्धिनी वटी (२ गोली) + पुनर्नवादि गुग्गुलु (२ गोली) + सिंहनाद गुग्गुलु (२ गोली) को गोमूत्र अर्क (४ चम्मच) व गुनगुने पानी के साथ सुबह-शाम खाली पेट लें तथा रात में गाय के घी के साथ गुनगुना दूध खड़े होकर पिएं।
  6. कील-मुहाँसे (Pimples):

    • उपाय: चंद्रप्रभा वटी (२ गोली) + पंचतिक्त घृत गुग्गुलु (२ गोली) गुनगुने पानी से भोजन के बाद लें तथा रात में चेहरे पर कुंकुमादि तैलम से हल्की मालिश करें। चेहरा धोने हेतु साबुन/शैम्पू बंद करके रीठा, शिकाकाई, आँवला या दही-बेसन का प्रयोग करें।
  7. कमर में झटका व दर्द:

    • उपाय: महायोगराज गुग्गुलु (२ गोली) + सिंहनाद गुग्गुलु (२ गोली) भोजन के बाद दूध से लें तथा अजवाइन की भाप से सिकाई करें।

७. शांति पाठ एवं समापन

सत्र का समापन निम्नलिखित शांति मंत्र के साथ हुआ:

"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"

अन्त में "नमस्ते, वंदे मातरम, राजीव भाई अमर रहें" के उद्घोष के साथ सत्र संपन्न हुआ।


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