53ग्रीष्म ऋतुचर्या:
वैद्य श्री सत्यवान् नायक जी द्वारा प्रदत्त ग्रीष्म ऋतुचर्या (आयुर्वेद अनुसार गर्मी के मौसम में आहार, विहार एवं जीवनशैली) के सम्पूर्ण व्याख्यान का एकीकृत व विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
ग्रीष्म ऋतुचर्या: सम्पूर्ण व्याख्यान (आहार, विहार व जीवनशैली)
1. ग्रीष्म ऋतु का काल, तर्पक कफ व प्राकृतिक प्रभाव
- समय व अवधि: ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव प्रतिवर्ष 16 मई से 15 जुलाई (ज्येष्ठ और आषाढ़ मास) तक रहता है।
- तर्पक कफ व जलस्तर घटना: वसंत ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने पर सिर के मज्जा स्थल/मस्तिष्क के तर्पक कफ (सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड) पर धूप पड़ने से कफ पिघलने लगता है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की प्रचंड किरणों के ताप से यह कफ पूरी तरह सूख जाता है। जैसे ग्रीष्मकाल में नदी, कुओं और तालाबों का जलस्तर घटने लगता है, उसी प्रकार मानव शरीर का जलस्तर भी घटने लगता है।
- मुख्य उद्देश्य: इस ऋतु में शरीर के कफ और जलस्तर को संतुलित रखना, वात एवं पित्त का शमन करना मुख्य उद्देश्य होता है।
- परिचर्या का व्यापक अर्थ: परिचर्या केवल खान-पान या रहना नहीं है; इसमें माता-पिता, गुरुजनों, अतिथियों, पत्नी, मित्रों, पड़ोसियों और कर्मचारियों के साथ हमारा सद्व्यवहार भी शामिल है। आयुर्वेद में 5 प्रकार की परिचर्या बताई गई है। व्यक्ति की प्रकृति (सत्त्व, रज, तम) के अनुसार भी आहार-विहार का चयन किया जाता है।
2. आहार संबंधी नियम (क्या खाएं और क्या न खाएं)
दूध और दही के नियम:
- गाय के दूध का निषेध: ग्रीष्म और वर्षा ऋतु (4 महीने) में गाय के दूध का सेवन वर्जित है। दिनभर प्रचंड धूप में घूमने के कारण गोमाता के शरीर में उष्णता आ जाती है, जिससे ग्रीष्म में गाय का दूध पीने से शरीर में पसीना, यकृत (लीवर) की गर्मी और जलन बढ़ सकती है।
- भैंस का दूध लाभकारी: इस ऋतु में भैंस का दूध पीने का विधान है। भैंस जल और कीचड़ में रहकर शीतलता धारण करती है, जिससे उसका दूध स्वभाव से शीतल होता है और शरीर में कफ व जलस्तर को बढ़ाता है।
- घी व छाछ: दोपहर के भोजन में छाछ और रात को सोने से पहले दूध में या भोजन में गाय का शुद्ध घी मिलाकर सेवन करना चाहिए।
पेय पदार्थ व शर्बत:
- मदिरा का विकल्प (मृतसंजीवनी सुरा): ग्रीष्म में सामान्य मदिरा वर्जित है क्योंकि यह तीनों दोषों को कुपित करती है। जो लोग मदिरा के अभ्यस्त हैं, वे रात को सोने से पहले मिट्टी के मटके के पानी में 10-20 चम्मच मृतसंजीवनी सुरा मिलाकर पिएं। यह मन को शांत कर अच्छी नींद लाती है, पाचन सुदृढ़ करती है और फुर्ती देती है।
- चने का सत्तू: भुने चने (जिसे वाजीप्रिय भी कहते हैं) का सत्तू बनाकर उसमें बराबर मात्रा में खांड, ढेले वाली मिश्री या ताल मिश्री मिलाएं। इसे सुबह मिट्टी के मटके के पानी के साथ पीने से दिनभर भूख और गर्मी नियंत्रित रहती है तथा अपार शक्ति मिलती है। सत्तू में गुड़ न मिलाएं, क्योंकि गुड़ तासीर में गर्म होता है।
- सुवासित जल: मिट्टी के मटके के पानी में मोगरा, चमेली, कमल की कली या गुलाब के फूल डालकर रातभर छोड़ दें। यह सुगंधित/सुवासित जल दिनभर पीने से मन स्थिर और प्रसन्न रहता है।
- लू (उष्माघात) से बचाव: मटके के पानी में 1-2 ग्राम भीमसेनी कपूर का चूर्ण मिलाकर पीने से धूप और लू का असर नहीं होता। जेब में प्याज (कांदा) रखें या नाक में 2 बूंद प्याज का रस या कपूर का जल डालें।
फलों का सेवन:
- आम का सेवन: ग्रीष्म ऋतु में आम का प्रचुर सेवन करना चाहिए। आम फलों का राजा है; यह धातुवर्धक, शुक्रवर्धक, बलदायक और विटामिन-डी से भरपूर होता है। यह मधुमेह (डायबिटीज), बीपी, लीवर व किडनी के रोगियों के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।
- जामुन का संतुलन: ग्रीष्म में भरपूर आम खाने के बाद आगामी वर्षा ऋतु में जामुन (प्रतिदिन लगभग 250 ग्राम) का सेवन करने से शर्करा/प्रमेह (शुगर) बढ़ने का भय समाप्त हो जाता है।
- अन्य फल: अनार (दाड़िम) रोज खाएं। इसके अतिरिक्त अनानास/सफरजन का सेवन करें, जो पेट के कृमियों (कीड़ों) का नाश करता है।
वर्जित आहार व रसों का विवेक:
- रस वर्जित: कटु (तीखा), अम्ल (खट्टा) और लवण (नमकीन) रसों का सेवन कम करें।
- त्याज्य पदार्थ: मिर्च-मसालों, तली-भुनी चीजों, पापड़, अचार, चाय, कॉफी, बॉर्नविटा, हॉरलिक्स और ठंडे पानी का सेवन बंद कर दें।
- दालें: मार्गशीर्ष मास तक उड़द और तुवर (अरहर) की दाल का सेवन न करें; केवल मूंग की दाल का सेवन करें।
- अन्न: ग्रीष्म में सूखी रोटियाँ कम खाएं; चावल, खिचड़ी, पेया व पतले अन्न का सेवन अधिक करें। धनिया व पुदीना की चटनी का सेवन करें।
3. विहार एवं दिनचर्या के नियम (जीवनशैली)
- लेप व उबटन: सफेद चंदन, उशीर (खस) और भीमसेनी कपूर का चूर्ण बनाकर कुएं के पानी या गुलाब जल में मिलाकर पूरे शरीर पर लेप करने से प्रचंड गर्मी में भी ठंडक मिलती है। लेप छुड़ाकर स्नान करने के लिए साबुन के बजाय बेसन का प्रयोग करें।
- खस के पर्दे व ताड़ का पंखा: दरवाजों और खिड़कियों पर खस (उशीर) के पर्दे/टट्टी लगाकर हर घंटे पानी का छिड़काव (स्प्रे) करने से घर में शीतल व सुगंधित हवा आती है। ताड़ के पत्ते के पंखे का उपयोग करें।
- वास्तु व मकान को ठंडा रखना: ग्रीष्मकाल में नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) से बहने वाली हवाएँ रोगकारक होती हैं; अतः दिन में नैऋत्य कोण का मुख्य द्वार व खिड़कियाँ बंद रखें। सीमेंट के मकानों की छत पर 4-5 दिन पहले पानी भरकर रखें या शाम को दीवारों व छतों पर पानी छिड़कें।
- वस्त्र व आभूषण: केवल पतले, महीन और सूती (कॉटन) वस्त्र पहनें; सिंथेटिक, प्लास्टिक निर्मित टी-शर्ट या मोटे कपड़े न पहनें। पित्त व वात शांति हेतु स्फटिक (फिटकरी) की माला धारण करें।
- धूप, व्यायाम व श्रम निषेध: सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक धूप में बाहर न निकलें। ग्रीष्म ऋतु में व्यायाम, कसरत, जिम जाना, दौड़ना और भारी परिश्रम करना बिल्कुल वर्जित है, क्योंकि इससे बल और धातु क्षीण होती है।
- अन्य नियम: मैथुन (स्त्री-प्रसंग) से दूर रहें। दोपहर में 1-2 घंटे विश्राम कर सकते हैं। शाम को बगीचों, नदी तट या प्राकृतिक उद्यानों में टहलें। रात्रि में चंद्रमा की चांदनी में खटिया पर सोएं।
4. विशेष औषधियाँ व आयुर्वेदिक उपचार
- अग्निमांद्य (पाचन की कमी): सुबह सोंठ (1 चम्मच) और काली मिर्च (1/2 चम्मच) को 1 गिलास पानी में उबालें; आधा गिलास रहने पर छानकर ठंडा करें और 1 चम्मच शहद मिलाकर पिएं।
- पसीना व जलन कम करने हेतु: मटके के पानी में दो चम्मच गुलकंद मिलाकर दिन में दो बार पिएं।
- शरीर व मूत्रदाह: चंद्रप्रभा वटी और चंद्रकला रस (2-2 गोली) मटके के पानी के साथ लें।
- कीड़े-मकौड़े व मधुमक्खी काटने पर: नारियल के तेल में भीमसेनी कपूर मिलाकर लगाएं या प्रभावित स्थान पर तुलसी का रस व शहद लगाएं।
5. ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी (अपरा / पापनाशिनी / जलक्रीड़ा एकादशी)
- महत्व: ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा, पापनाशिनी और जलक्रीड़ा एकादशी कहा जाता है। वैद्यों से रोगियों के इलाज के दौरान अनजाने में हुए पापों के शमन के लिए यह एकादशी अत्यंत कल्याणकारी है।
- जलक्रीड़ा का विधान: इस दिन से 1.5 महीने तक भीषण गर्मी बढ़ती है, इसलिए नदी या तालाब में 2-3 घंटे स्नान व जलक्रीड़ा करने का विधान है।
- व्रत नियम: एकादशी के दिन 8 प्रकार के धान्यों (चावल, गेहूं, मूंग आदि) का त्याग करें। केवल जल, तुलसी जल, फलाहार या दूध-घी का सीमित सेवन करें। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ या 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का जप करें।
- पारण: अगले दिन तुलसी जल और मूंग दाल की खिचड़ी में प्रचुर घी डालकर व्रत का पारण करें।
6. प्रश्नोत्तरी सत्र के मुख्य समाधान
- गिलोय (गुडूची) के विभिन्न प्रयोग:
- कब्ज में: गिलोय का ठंडा काढ़ा शहद मिलाकर पिएं।
- उल्टी में: गिलोय का काढ़ा या रस ठंडा करके शहद मिलाकर लें।
- खुजली व पसीने में: गिलोय के काढ़े में मिश्री मिलाकर पिएं।
- वात रोगों में: गुनगुने काढ़े में सेंधा नमक मिलाकर पिएं।
- पित्त रोगों में: गिलोय के साथ पिप्पली या मिश्री मिलाकर लें।
- कमजोरी व दुबलापन: आरोग्यवर्धिनी वटी (2 गोली) और लक्ष्मीविलास रस (2 गोली) का सेवन करें।
- कमर दर्द व वजन नियंत्रण: सप्तामृत लौह, पुनर्नवादि मंडूर / मेहरहर क्वथ या गोमूत्र अर्क लें; कमर पर विषगर्भ तेल व तिल तेल मिलाकर मालिश करें।
- वात-पित्त का स्थायी शमन: नियमित रूप से प्रचुर मात्रा में घी का सेवन करें, शरीर पर तेल मालिश करें और रात को सोने से पहले पैरों के तलवों में सरसों का तेल या घी रगड़ें।
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