38 वसंत ऋतुचर्या

 वैद्यमित्र सत्यवान नायक जी द्वारा टेलीग्राम वीडियो मीटिंग में ऋतुचर्या, कालगणना, वात दोष लक्षण एवं रोगोपचार पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है, जिसके प्रत्येक बिंदु, उदाहरण एवं नियमों का विवरण नीचे प्रस्तुत है:

1. कालगणना के प्रकार एवं मेष संक्रांति (सौर नववर्ष) का विशेष विधानभारत में कालगणना के 4 मुख्य प्रकार बताए गए हैं: सौर कालगणना,

मेष संक्रांति का अमोघ नियम व उदाहरण: 

मेष संक्रांति के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर तांबे के लोटे या मिट्टी के कलश में जल लेकर नीम के वृक्ष के पास जाना चाहिए।

नीम के वृक्ष को भगवान सूर्य/विष्णु स्वरूप मानकर जल अर्पित करें और सात बार परिक्रमा करते हुए "ॐ सुप्रभात स्वाहा" तथा "ॐ स्वधायै स्वाहायै" मंत्रों का उच्चारण करें।

परिक्रमा के पश्चात नीम के पौधे से गिनती करके 7 ताजे फूल (सफेद/पीले रंग के) तोड़ें और बिना चबाए सीधे पानी के साथ निगल लें।

लाभ: केवल एक दिन यह प्रयोग करने से पूरे 1 वर्ष तक प्रमेह (मधुमेह), चर्म रोग, रक्त विकार, लिवर या अग्न्याशय (पैनक्रियाज) की खराबी, अग्निमांद्य (पाचन की कमी), बुखार (ज्वर), तथा पैरों के तलवों में जलन या एड़ियों में दर्द नहीं होता।

2. वसंत ऋतुचर्या एवं जल-पान के नियम

वसंत ऋतु के प्रथम महीने (चैत्र) में पिघले हुए कफ को बाहर निकालने के लिए वमन आदि कराने की सलाह दी जाती है तथा मधुर रस का सेवन सीमित रखा जाता है। दूसरे महीने (वैशाख) में प्रचंड सूर्य किरणों के प्रभाव से कफ निकल चुका होता है, इसलिए दोपहर के समय मधुर रस तथा शीतल पेय (गन्ने का रस, खांड/गुड़ का शर्बत, मिश्री का शर्बत) प्रतिदिन पीने का विधान है।

जल-पान का नियम (सूर्यास्त के पूर्व व पश्चात): 

आयुर्वेद के अनुसार केवल सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच ही मुख्य रूप से जल पीना चाहिए।

सूर्यास्त के पश्चात जल की मात्रा अत्यंत कम (अधिकतम 1 गिलास या केवल गला तर करने जितना) रखनी चाहिए।

मिट्टी के टीले का उदाहरण: जैसे किसी मिट्टी के टीले पर एक-एक बूँद पानी धीरे-धीरे सोखा जाता है, परंतु यदि बाल्टी भरकर पानी डाल दिया जाए तो वह बह जाता है; ठीक वैसे ही सूर्यास्त के बाद अधिक पानी पीने से वह अवशोषित नहीं होता और बहुमूत्र, प्रमेह, मंदाग्नि तथा ग्रहणी (IBS) रोग उत्पन्न करता है।

शरीर के वजन अनुसार जल की मात्रा की गणना: 

शरीर के वजन (किलोग्राम) में 10 का भाग देकर प्राप्त संख्या में से 2 घटाएं। उदाहरणस्वरूप, यदि वजन 70 किलो है, तो \(70 \div 10 = 7\), और \(7 - 2 = 5\) लीटर जल ग्रीष्म एवं शरद ऋतु के लिए उपयुक्त है।

शीत ऋतु में इसका आधा (2.5 लीटर) तथा वसंत व वर्षा ऋतु में 3.5 से 4 लीटर जल पीना चाहिए।

3. वात दोष प्रकुपित होने के लक्षण

शरीर में वात दोष प्रकुपित होने पर निम्नलिखित लक्षण प्रकट होते हैं:

पेट एवं पाचन की स्थिति: भोजन करने या न करने पर भी पेट गुब्बारे (बैलून) की तरह फूला रहना और ऊपर से छूने पर पत्थर की तरह कड़ा लगना। मुँह व जीभ का स्वाद कसैला (जामुन या आम के पत्ते जैसा) होना तथा हरा, लाल या गुलाबी मल निकलना। बार-बार बकरी की तरह थोड़ा-थोड़ा कुछ न कुछ खाने की इच्छा होना।

शारीरिक रूखापन व शिथिलता: बिना तेल लगाए बाल तुरंत सूखे-रूखे दिखना, होंठ, त्वचा व एड़ियाँ फटना, चेहरे पर झुर्रियाँ/दरारें आना। काम करने, चलने-फिरने या बोलने की इच्छा न होना।

अंगड़ाई, जंभाई व घबराहट: बार-बार अंगड़ाई और जंभाई (उबासी) आना। हृदय में कंपन होना, धड़कन बढ़ना, अकारण घबराहट होना तथा अत्यधिक नकारात्मक विचार आना (जैसे- कोई मुझे मार देगा, लोग मेरी निंदा करते हैं, मुझसे द्वेष करते हैं)।

त्वचा व जोड़ों में तीव्र पीड़ा: पूरे शरीर में सुई या कांटा चुभने जैसी पीड़ा होना। शरीर के 360 जोड़ों (पर्व/संधि) में आरी से काटने या नुकीली सुई घोपने जैसी तीव्र वेदना होना।

अंगों का शीतल पड़ना व झनझनाहट: हाथ-पैर या पूरा शरीर ठंडा (शीतल) पड़ना (जबकि आयुर्वेद अनुसार सिर ठंडा, पेट नरम और पैर गर्म रहने चाहिए)। हाथ-पैरों व त्वचा में झनझनाहट (संस्कृत में 'तप्यथु') होना।

कानों में आवाज़ें आना व मानसिक स्थिति: कानों में भंवरे या हवा जैसी गूँज होना, जिससे स्मरण शक्ति, नींद, दृष्टि व धैर्य कमजोर होता है। नींद में बड़बड़ाना, बिना कारण हँसना, रीढ़ की हड्डी का कुबड़े जैसा झुक जाना, रोएँ सुई की तरह कड़े होना।

नींद व स्मरण शक्ति: भोजन के बाद सोने पर 1-2 घंटे में नींद टूट जाना, अत्यधिक प्यास व बार-बार पेशाब लगना, और कही हुई बात तुरंत भूल जाना।

4. वात दोष के निवारण एवं औषधीय उपचार

दैनिक आहार व मालिश: प्रतिदिन दूध में देसी गाय का घी डालकर पीना तथा स्नान से आधा घंटा पूर्व पूरे शरीर में तेल की मालिश (अभ्यंग) करना। 

आँवले का प्रयोग: रविवार और गुरुवार को छोड़कर प्रतिदिन मिट्टी के मटके के पानी में 1 चम्मच आँवले का चूर्ण या रस मिलाकर सेवन करना।

मानस मित्र वटी: अत्यधिक घबराहट, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों में मानस मित्र वटी को माषादिक्वथ (10-15 चम्मज माषादि क्वाथ + 50 ml पानी) के साथ सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के बाद लेना।

रात्रिकालीन घृत पान: रात को सोने से पूर्व गुनगुने दूध में 4-5 चम्मच ब्राह्मी घृत, महाकल्याणक घृत या सारस्वत घृत डालकर खड़े होकर पीना।

अन्य औषधियाँ: दशमूलारिष्ट, महारास्नादि क्वाथ, त्रिफला चूर्ण, हरितालिका चूर्ण (घी के साथ), श्वेत मूसली तथा सात्विक हास-परिहास व सत्संग भी वात शमन में सहायक हैं।

5. अमोघ प्रयोग: हार्ट अटैक, बीपी व पैरालिसिस से बचाव

हार्ट अटैक रोधक प्रयोग: महीने में केवल एक बार 1 चम्मच हरीतकी (हरड़) चूर्ण में 2 चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर सुबह खाली पेट सेवन करें।


लाभ: इस प्रयोग से जीवनभर हार्ट अटैक, पैरालिसिस (लकवा), बीपी, कोलेस्ट्रॉल वृद्धि व हृदय की घबराहट से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।


6. कानों में तेल भरने (कर्णपूरण) की विधि व लाभ


कर्णपूरण तेल निर्माण विधि: 100 ग्राम सरसों के तेल में 10 ग्राम छिला व कुटा हुआ लहसुन, 1 चम्मच अजवाइन और बेलपत्र के 3 पत्ते (कुल 9 पत्तियाँ) डालकर धीमी आँच पर पकाएँ। झाग समाप्त होने पर छानकर रख लें।


प्रयोग विधि: एक कान में 1 से 1.5 चम्मच तेल पूरा भरकर 1 घंटे तक बिस्तर पर लेटे रहें। इसके बाद बचे तेल को कनपटी व बालों में लगा लें। यह प्रयोग सप्ताह में या 15 दिन में एक बार प्रत्येक कान में अलग-अलग दिन करें।


लाभ: कानों की वायु दूर होती है, जिससे ब्रेन हेमरेज, स्मरण शक्ति की कमी, अनिद्रा, हाई बीपी, और आँखों के चश्मे का नंबर बढ़ने से बचाव होता है।


7. व्यायाम, दौड़ने (रनिंग) एवं दिनचर्या के नियम


प्रातः काल दौड़ने का निषेध: प्रातः काल कफ का समय होता है, उस समय दौड़ने से शरीर में कफ घटता है तथा वात व पित्त प्रकुपित होते हैं, जिससे मन अत्यधिक अस्थिर व चंचल हो जाता है।


सही नियम: सुबह शांत रहकर ध्यान, प्राणायाम और दूब/घास पर नंगे पाँव टहलना चाहिए।


संध्या समय दौड़ना: यदि दौड़ना ही हो तो संध्या काल में दौड़ना चाहिए। दौड़ने से पूर्व खाली पेट रहने के बजाय कफ बढ़ाने वाले पदार्थ जैसे दही, मक्खन, मलाई या छाछ का सेवन करके दौड़ना चाहिए ताकि वात संतुलित रहे।


8. आपातकालीन/घरेलू चिकित्सा व अन्य शंका-समाधान


रक्तस्राव (चोट/कटने पर) रोकने के उपाय: गोमय भस्म (गाय के गोबर की राख), शुद्ध सूती कपड़े (काले रंग को छोड़कर) की राख, सूखे पत्तों का पाउडर, हल्दी, शहद, बीड़ी/सिगरेट की राख या लार (थूक) लगाने से रक्त तुरंत रुक जाता है। 


विशेष चेतावनी: काले कपड़े की राख का प्रयोग कभी न करें, अन्यथा 7 दिनों तक अत्यधिक डरावने सपने आते हैं।


बहती नाक व सर्दी का उपचार: वसंत ऋतु में बहती नाक को तुरंत न रोकें; 4 गिलास पानी में मुलेठी उबालकर हल्का गुनगुना पीकर उल्टी (वमन) करें।


दूध खड़े होकर पीने का कारण: दूध पानी से हल्का होता है; खड़े होकर पीने से यह शरीर के सभी 360 जोड़ों और अंगों में सुगमता से पहुँचकर वात का शमन करता है।


ग्रहणी (IBS) रोग में ध्यान देने योग्य बातें: भारी भोजन (कटहल, उड़द आदि), तला-भुना (समोसा, कचौड़ी), चाय-कॉफी, फ्रिज का पानी/भोजन व अत्यधिक चिंता वर्जित है; मन को प्राचीन राजा-रानियों की कहानियों व भगवद्गीता के पठन से प्रसन्न रखें।


देसी गाय के घी का महात्म्य: देसी गाय का घी मुख से प्रवेश कर शरीर के विष व गंदगी को बाहर निकालता है तथा शुक्र धातु का निर्माण करता है।


आयुर्वेद का उद्देश्य: आयुर्वेद में 88,000 प्रकार के रोग तथा प्रत्येक रोग के 600 प्रकार के उपचार बताए गए हैं। इसका मूल लक्ष्य जन-जन तक मौलिक आयुर्वेद पहुँचाकर रोगमुक्त एवं औषधमुक्त भारत का निर्माण करना है।




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