हेमन्त ऋतुचर्या (भाग-2)
1. व्याख्यान का प्रारम्भ एवं संसार के 6 मुख्य सुख
व्याख्यान की शुरुआत मंगलाचरण तथा गुरुजनों व माता-पिता के वंदन से होती है। इसके पश्चात् महर्षि सुश्रुत के श्लोक "आरोग्यम् अनुराधा सुखाने राजन..." के माध्यम से संसार में सुख के 6 मुख्य साधनों का वर्णन किया गया है:
- आरोग्यम्: शरीर का पूर्णतः रोगों से मुक्त होना संसार का सबसे बड़ा सुख है।
- अनृणी: किसी का कर्जदार (ऋणी) न होना।
- अप्रवासी: अपनी मातृभूमि या जन्मभूमि में ही निवास करना, रोजगार के लिए परदेश (प्रवास) न जाना पड़े। परदेश में रहने का कष्ट केवल वही समझ सकता है जो प्रवास में रहता है।
- सज्जन/वैष्णव संग: सदा साधु-संतों, हरि-भक्तों से घिरा रहना तथा परमेश्वर व शास्त्रों के विषय में चर्चा करना; ऐसे व्यक्ति के पास दुख आने पर भी दुख का अनुभव नहीं होता।
- स्वप्रत्यय वृत्ति (इच्छा अनुसार कार्य): अपनी अभिलाषा और रुचि के अनुसार कार्य करना।
- उदाहरण: राजीव दीक्षित जी के विचारों से जुड़े कार्यकर्ताओं में राष्ट्रभक्ति की भावना होती है। परंतु यदि कोई व्यक्ति मजबूरी में या पापी पेट/रोजी-रोटी के लिए मन मारकर काम करता है, तो वह भीतर से दुखी रहता है और महर्षि सुश्रुत के अनुसार यही स्थिति मानसिक रोगों का मुख्य कारण बनती है।
- त्रिगुणात्मक आत्म-संतोष: शरीर, मन, इंद्रिय और आत्मा चारों का सुखी रहना।
2. आयुर्वेद के नियमों की आवश्यकता एवं सुश्रुत संहिता का सिद्धांत
अक्सर लोग सोचते हैं कि आयुर्वेद के कठिन नियमों का पालन क्यों करें, जब बीमार पड़ेंगे तब देखा जाएगा। इसके उत्तर में महर्षि सुश्रुत का श्लोक प्रस्तुत किया गया है:
"प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरतादस्पर्शनं वरम्"
- बीमार पड़ने पर होने वाली 5 हानियाँ: यदि रोग होने के बाद इलाज किया जाए तो केवल नुकसान ही होता है—
- धन का नाश (अर्थ नाश),
- शारीरिक कष्ट व पीड़ा,
- प्राणों की पीड़ा,
- समय का विनाश,
- घर-गृहस्थी में अशांति और परिवार के सदस्यों का कष्ट।
- सिद्धान्त की चोरी: जर्मन डॉक्टर हैनीमैन (Hahnemann) ने सुश्रुत संहिता के इसी सिद्धांत को लेकर अंग्रेजी में "Prevention is better than cure" का नाम दिया।
- बाल्मीक (दीमक का ढेर/बमीठा) और चींटी का उदाहरण:
"वल्मीकं कारणं ह्येतत् सूक्ष्मः पिपीलिकाः..."
- उदाहरण: बगीचों या जंगलों में छोटी-छोटी चींटियाँ (पिपीलिका) धीरे-धीरे मिट्टी जमा करते-करते 25 से 30 फीट ऊँचा विशाल बाल्मीक (बमीठा) बना देती हैं।
- रामायण का प्रसंग: रत्नाकर डाकू ने नारद जी के उपदेश पर 'मरा-मरा' (राम-राम) का जप किया और जप करते-करते बाल्मीक से ढके गए; बाद में नारद व ब्रह्मा जी के ज्ञान से बाल्मीक से उनका नया जन्म हुआ, जिससे उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।
- सीख: यदि शुरुआत में स्वास्थ्य की छोटी-छोटी उपेक्षाओं पर ध्यान न दिया जाए, तो वे शरीर में बाल्मीक की तरह भयंकर रोग बन जाती हैं।
3. ऋतु-विकृति, वायु प्रदूषण, नक्षत्र व 9 ग्रह
- वायु दूषित होने के परिणाम: हेमंत ऋतु में वायु दूषित होने से कास (खांसी), श्वास, यकृत (लिवर) खराबी, प्रतिश्याय (नजला/जुकाम/साइनस) और संपूर्ण देशवासियों में ज्वर (बुखार) का प्रकोप बढ़ जाता है। चरक संहिता के 'जनपदोद्ध्वंस' (देशोपद्रव) अध्याय में भी इसका वर्णन है।
- केवल 9 ग्रहों का प्रभाव क्यों?:
- महानगर का उदाहरण: जिस प्रकार महानगर में लाखों लोग रहते हैं, परंतु हमारा संबंध केवल उन्हीं से होता है जिनसे हमारा परिचय या कार्य है; उसी प्रकार ब्रह्मांड में अनगिनत ग्रह होने पर भी पृथ्वी (मृत्युलोक) पर केवल 9 ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु) का ही प्रभाव पड़ता है।
- अनिष्ट नक्षत्र व शांति उपाय: अश्विनी आदि नक्षत्रों के अनिष्ट प्रभाव से मसूरिका, रोमान्तिका, मस्तिष्क-सुम्ना ज्वर, रोहिणी आदि रोग फैलते हैं। इनकी शांति हेतु घर में हवन करना, संध्यावंदन, मन्त्र जप, दान, प्राणिमात्र पर दया, प्रणाम, नियम-तपस्या तथा देव-ब्राह्मण-गुरु की भक्ति करने का निर्देश है।
4. जल सेवन के नियम: शीतल जल बनाम उष्ण जल (गर्म पानी)
- शीतल (ठंडा) जल पीने के नुकसान:
- हेमंत व शिशिर ऋतु में ठंडा पानी पीने से रूक्षता, शीतलता और वायु-दोष बढ़ता है।
- शौच के समय अधिक वायु निकलने या पेट साफ न होने की शिकायत वाले लोगों को केवल गर्म पानी पीना चाहिए।
- ठंडा पानी पीने से पित्त वृद्धि, विषक्रिया, बीपी हाई होना, चक्कर (भ्रम), शरीर में जलन, आलस्य, खाना न पचना, मल रुकना या अतिसार होना जैसी समस्याएँ होती हैं।
- उष्ण (गर्म) जल पीने के लाभ:
- कफ शमन, बल वृद्धि, रक्त व शुक्र धातु को शक्ति, कोलेस्ट्रॉल व यूरिक एसिड कम करना, आमाशय के आम (अपाचित भोजन) का पाचन, भूख बढ़ाना, किडनी का शोधन तथा कास-श्वास-ज्वर का नाश।
- जल उबलने का शास्त्रीय नियम (अष्टांग हृदय):
- 1/4 भाग जल जल जाए (3/4 भाग शेष रहे): वात दोष का शमन करता है तथा सभी के लिए अमृत तुल्य पथ्य है।
- 1/2 भाग जल जल जाए (1/2 भाग शेष रहे): वात और पित्त दोनों दोषों का नाश करता है।
- 3/4 भाग जल जल जाए (1/4 भाग शेष रहे): त्रिदोष नाशक (वात, पित्त, कफ तीनों का शमन करने वाला) होता है।
5. हेमंत ऋतु की महिमा एवं नित्य दिनचर्या
- सभी ऋतुओं में हेमंत ऋतु को सबसे श्रेष्ठ माना गया है ("श्रेष्ठं तमं हेमन्तं")।
- प्रातःकालीन चर्या:
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हों।
- भगवान शिव, श्रीहरि विष्णु/जगन्नाथ जी की आराधना करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- प्रातः भरपेट भोजन करें, फिर 2 घंटे बाद वातनाशक तेल से शरीर की मालिश (अभ्यंग) करें।
- मालिश के 20 मिनट बाद अपनी शक्ति अनुसार दारा सिंह की तरह कुश्ती/व्यायाम करें।
- व्यायाम के बाद शरीर पर अगुरु, दशांग लेप या चूर्ण का लेप लगाएं।
- प्रातः स्नान का नियम: प्रातःकाल केवल नदी, कुएं या तालाब के जल से स्नान करें (जिसमें से प्रातः स्वाभाविक भाप निकलती है)। अपार्टमेंट की टंकी के ठंडे पानी या प्रातः हीटर के पानी से नहाने से वात बढ़ता है।
- दोपहर स्नान: बाल्टी में पानी भरकर धूप में रखें ताकि उसमें विटामिन-डी आ जाए; फिर उसी गुनगुने जल से दोपहर में स्नान करें।
- अष्टाक्षर मंत्र जप: 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का जप करें, जो उदर रोग, वात रोग और भव-भय से मुक्ति दिलाता है।
- सायंकालीन नियम: सायं सूर्यास्त के 1.5 घंटे के भीतर (डेढ़ प्रहर के अंदर) भोजन कर लें तथा पुनः तेल मालिश करें।
6. हेमंत ऋतु में क्या खाएं (पथ्य आहार व औषधियाँ)
- उष्ण पद स्नान: धूप में बैठकर तेल मालिश करें जिससे पसीने (स्वेद) के माध्यम से मलों का शोधन हो। प्रातःकाल गर्म पानी में पैरों को डुबोकर रखें।
- अग्नि सेवन (अलाव/पागल): गांव में खेतों के सूखे अवशेष (पागल/पुआल) को जलाकर उसकी अग्नि तापे, इससे ठंड भाग जाती है।
- हरीतकी (हरड़):
- 10 ग्राम हरड़ चूर्ण में 2.5 ग्राम सोंठ चूर्ण मिलाकर गुनगुने पानी से लें।
- प्रातः खाली पेट बराबर मात्रा में हरड़ + गुड़ मिलाकर खाएं और रात को हरड़ चूर्ण गर्म पानी से लें।
- कच्चा बेल फल: कच्चे बेल का गूदा पीसकर दोपहर में गर्म पानी में घोलकर पिएं (सप्ताह में 1-3 दिन)।
- बहेड़ा की गिरी (मंगी): बहेड़े के फल के अंदर की गिरी गरीबों के लिए बादाम व अखरोट के समान है। यह दिमाग को ताकत देती है, सर्दी-खांसी, वात, गठिया और बार-बार होने वाले बुखार को रोकती है।
- अदरक रस + शहद: 1 चम्मच अदरक का रस + 1 चम्मच शहद मिलाकर दिन में एक बार लें।
- भांग का पत्ता: सप्ताह में 1 या 2 दिन भांग के पत्तों का चूर्ण/पिष्टी गुनगुने मीठे दूध में मिलाकर रात को पिएं। इससे नींद अच्छी आती है, बीपी, कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लीसराइड नियंत्रित रहता है और नसों को ताकत मिलती है।
- लौंग: भोजन के तुरंत बाद 1-1 लौंग मुंह में रखकर चूसें (दिन में 3 बार या रात को 1 लौंग)।
- कैथ (कपित्थ) फल: रात को भोजन के बाद कैथ के गूदे में शहद मिलाकर खाएं। (विशेष सावधानी: कैथ का फल दिन में कभी न खाएं, वरना अलक्ष्मी का वास और ग्रहणी/आईबीडी का भयंकर रोग हो जाता है)।
- साग व मसाले: सौंफ, पिप्पली, मेथी, चोलाई का साग व मरिच का साग खाएं। धनिया, हींग, काली मिर्च और शुद्ध घी (सप्ताह में 1-2 दिन) का प्रयोग करें।
- गुरुवार का विशेष नियम: गुरुवार के दिन रात्रि में भोजन न करके केवल दूध की खीर बनाकर पिएं।
- लहसुन, परवल, इलायची व जायफल:
- लहसुन हृदय को बल देता है।
- मुखवास हेतु इलायची जेब में रखें।
- दस्त रोकने तथा मैथुन शक्ति (दम्पति जीवन) बढ़ाने हेतु जायफल को चंदन की तरह घिसकर लें।
- दही, छाछ, जलेबी व मुनक्का: दोपहर में दही व छाछ लें। गेहूं के आटे से बनी जलेबी और मुनक्का खाएं।
- अंकुरित अनाज व आहार: व्यायाम के बाद अंकुरित मूंग, उड़द, चना खाएं। पका तरबूज, खीरा, ककड़ी, तोरई, मूंग व उड़द की दाल का सेवन करें।
- मांसाहार नियम: मांसाहारी व्यक्तियों हेतु केवल तालाब से पकड़ी गई ताजी मछली का सेवन निर्दिष्ट है।
- मूली का विशेष प्रयोग: हेमंत ऋतु में मूली का अत्यधिक सेवन करने से 1 वर्ष तक अम्लपित्त (एसिडिटी), बवासीर, गठिया, यूरिक एसिड और अग्निमांद्य की समस्या नहीं होती।
- अन्य पथ्य: गर्म पानी में नींबू + काला नमक, अनार, अंगूर, झरने का जल, वर्षा का सहेजा गया जल (पल-पानी/कलर-पानी), कुएं का जल, पुराना गेहूं और नया चावल तथा साठी चावल का सेवन करें।
7. हेमंत ऋतु में क्या न खाएं / वर्जित (अपथ्य)
- अत्यंत ठंडी चीजें, ठंडा पानी (प्रातः नदी/कुएं स्नान छोड़ कर) और अत्यधिक शीतल स्थानों से बचें।
- केवल कसैले (कषाय) रस वाले पदार्थ (जैसे केवल जामुन) न खाएं।
- नदी का साग, अकेला चना, आलू, पुराना चावल, जौ या जौ का दलिया, पुराना तेल, मटर और पुराना ज्वार न खाएं।
- दिन में सोना (दिवास्वप्न), उपवास रखना या दिन में केवल एक बार भोजन करना वर्जित है। हेमंत ऋतु में दिन भर में 3 बार भोजन करना चाहिए, अन्यथा वात प्रकोप होता है।
- कड़वे (तिक्त), तीखे (कटु), रूखे-सूखे पदार्थ और मटके का ठंडा पानी वर्जित है।
- भैंस का दूध: भैंस का दूध ठंडा होता है, इसलिए हेमंत में भैंस का दूध न पिएं।
- सिंघाड़ा की सीमा: एक दिन में 8 तोले (लगभग 100 ग्राम) से अधिक सिंघाड़ा न खाएं, वरना वात बढ़ेगा और जठराग्नि मंद हो जाएगी।
- कसेरू का साग: कसेरू का साग यूरिक एसिड बढ़ाता है, अतः इसका सेवन न करें।

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