जीवन का मूल मंत्र क्या है — सप्तविंशति सर्ग (27वें सर्ग)
जीवन का मूल मंत्र क्या है — सप्तविंशति सर्ग (27वें सर्ग)
सत्र का शुभारंभ मंगलाचरण और गायत्री मंत्र के उच्चारण के साथ होता है:
"ओम भूर भुव स्वाहा तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात। ओम सहना भवतु सहनो भुनक्तु सहवीर्यं करवावह तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ओम शांति शांति शांति।"
यह चर्चा "जीवन का मूल मंत्र क्या है" विषय के अंतर्गत सप्तविंशति सर्ग (27वें सर्ग) पर आधारित है। इसमें सृष्टि और कर्म के गूढ़ रहस्यों को कहानियों, कौटिल्य अर्थशास्त्र के सूत्रों, श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण, पतंजलि योग दर्शन और चरक संहिता के माध्यम से बहुत ही विस्तार और उदाहरणों के साथ समझाया गया है।
१. नगर सेठ और पंथ निवास के पहरेदार की कहानी — कर्म फल का रहस्य
कर्म और उसके फल के रहस्य को समझाने के लिए एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया गया है:
एक नगर सेठ किसी दूसरे नगर की यात्रा पर जा रहे थे। संध्या होने और सूर्यास्त होने के कारण उन्होंने रास्ते में एक पंथ निवास (धर्मशाला जैसी जगह) में ठहरने का निर्णय लिया। पहले के समय में पंथ निवास में यात्रियों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था बहुत कम मुद्राओं में हो जाती थी और जाते समय यात्री अपनी स्वेच्छा से कुछ उपहार या धनराशि देकर विदा लेते थे।
उस पंथ निवास में अन्य कई बड़े और अत्यंत धनवान नगर सेठ भी रुके हुए थे, जिनके पास बहुत सारे घोड़े, नौकर-चाकर और अत्यंत कीमती वस्त्र व आभूषण थे। वहां नियुक्त पहरेदार (सेवक) ने जब इस साधारण नगर सेठ को देखा, तो उसने सोचा कि यह तो थोड़ा कम धनवान लग रहा है, यह भला मुझे क्या धन देगा! इसी सोच के कारण उसने उस सेठ की उपेक्षा की। जब सेठ पानी मांगते तो वह बहुत देर से लाता, तकिया या कंबल मांगने पर भी बहुत विलंब करता और उन पर ध्यान नहीं देता था। इसके विपरीत, वह अन्य अमीर सेठों के बुलाने पर तुरंत हाजिर हो जाता, उन्हें गर्म पानी, बढ़िया तकिया-कंबल देता और रात को सोने से पहले उनके पैरों की मालिश भी करता था।
अगले दिन सुबह जब प्रस्थान की बारी आई, तो अन्य अमीर सेठों ने जाते समय उस सेवक को १० या १२ स्वर्ण मुद्राएं दीं। लेकिन, जिस साधारण नगर सेठ की सेवक ने पूरी रात उपेक्षा की थी, उन्होंने जाते समय उसके हाथ में १०० स्वर्ण मुद्राएं थमा दीं।
सेवक को कई दिनों तक रात में नींद नहीं आई। वह मन ही मन भारी पश्चाताप (अनुताप) करने लगा कि "मैंने उन भला मानस सेठ की सेवा नहीं की, पानी और तकिया भी देर से दिया, फिर भी उन्होंने मुझे इतनी बड़ी धनराशि दी, जबकि इन अमीर सेठों की मैंने इतनी चाकरी की और उन्होंने मात्र १०-१२ मुद्राएं दीं"। उसने संकल्प किया कि यदि वे सेठ दोबारा आएंगे, तो वह उनकी जी-जान से सेवा करेगा।
लगभग छह-आठ महीने बाद, वह नगर सेठ पुनः उसी मार्ग से जा रहे थे और सूर्यास्त होने पर उसी पंथ निवास में रुके। सेवक उन्हें दूर से ही देखते ही अत्यधिक प्रसन्न हुआ और दौड़कर आया। उसने उनके घोड़े से सामान उतारा, स्नान के लिए गर्म पानी की व्यवस्था की, शरीर पर सुगंधित तेल का मर्दन (मालिश) किया और स्वादिष्ट पकवान बनाकर खिलाए। रात में बिना मांगे ही आरामदायक तकिया, कंबल दिए और श्रद्धापूर्वक उनके पैरों की तेल से खूब मालिश की। सुबह उठने पर उसने उन्हें काढ़ा और लघु आहार दिया तथा आदर भाव प्रदर्शित किया।
प्रस्थान के समय अन्य सेठों ने वही १०-१२ या १५-२० स्वर्ण मुद्राएं दीं। इस बार उस सेवक ने सोचा कि ये सेठ उसे और भी अधिक स्वर्ण मुद्राएं देंगे। परंतु, इस बार नगर सेठ ने उसके हाथ में केवल १० स्वर्ण मुद्राएं थमाईं और "ईश्वर तुम्हारा भला करे" कहकर आगे बढ़ गए।
सेवक फिर से कई दिनों तक गहरी चिंता और सोच-विचार में डूब गया और उसे नींद नहीं आई। वह समझ नहीं पा रहा था कि "जब मैंने सेवा नहीं की थी, तब १०० मुद्राएं मिलीं; और जब मैंने अपनी पूरी शक्ति से आदर-सत्कार किया, तो केवल १० मुद्राएं मिलीं! ऐसा क्यों?"
लगभग दो-ढाई या तीन वर्ष बाद, जब वह नगर सेठ पुनः उसी पंथ निवास में आए, तो सेवक ने उनके पास आकर अपनी शंका रखी और इस रहस्य का उत्तर मांगा।
नगर सेठ ने मुस्कुराकर सृष्टि और कर्म का रहस्य समझाते हुए कहा:
"यह सारा संसार का और सृष्टि का रहस्य यही है। हम जो करते हैं, कभी-कभी आने वाले समय का फल हमें पहले मिल जाता है और कभी-कभी पिछले कर्म का फल हमें बाद में भोगने को मिलता है। पहली बार जो मैंने तुम्हें १०० स्वर्ण मुद्राएं दी थीं, वह अग्रिम (एडवांस) थीं ताकि तुम आगे चलकर मेरी अच्छी सेवा करो (जो तुमने दूसरी यात्रा में की)। और दूसरी बार जो मैंने तुम्हें केवल १० स्वर्ण मुद्राएं दीं, वह तुम्हारे उस पिछले आचरण (उपेक्षा और खराब व्यवहार) का फल था, जो तुमने पहली बार मेरे साथ किया था।"
२. श्रीमद्भगवद्गीता: कर्म की सिद्धि के पांच कारण
इस सृष्टि के कर्म रहस्य को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के १८वें अध्याय (मोक्ष योग) के श्लोक १२ से १६ का संदर्भ दिया गया है।
श्लोक १२ का सार
जो मनुष्य कर्मों के फल का त्याग नहीं करते, उन्हें मृत्यु के पश्चात अच्छा, बुरा या मिश्रित—तीन प्रकार का फल अवश्य मिलता है। किंतु जो कर्म फल का सर्वथा त्याग कर देते हैं, उन्हें कर्म का फल कभी भी प्राप्त नहीं होता (वे बंधनमुक्त रहते हैं)।
श्लोक १३ और १४
सांख्य शास्त्र के अनुसार किसी भी कर्म की सफलता या सिद्धि के लिए पाँच कारण बताए गए हैं:
"अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥"
ये पाँच कारण निम्नलिखित हैं:
१. अधिष्ठान (आधार)
कार्य का मुख्य आधार या स्थान। जैसे—किसान के लिए उसकी खेती; वैद्य के लिए उसकी वैदशाला, औषधीय प्रयोगशाला या रोगी।
२. कर्ता (करने वाला)
स्वयं कार्य को निष्पादित करने वाला व्यक्ति। जैसे—किसान या वैद्य।
३. करण (साधन)
कार्य को करने के साधन या माध्यम। जैसे—किसान के लिए हल, बैल, उत्तम बीज, सिंचाई के साधन और कार्य के प्रति उसकी लगन व श्रद्धा। वैद्य के लिए विभिन्न औषधियां, जड़ी-बूटियां, भस्म, खरल और रोगी को ठीक करने का सिद्धांत व आस्था।
४. विविध चेष्टा (पुरुषार्थ/प्रयास)
लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए की जाने वाली निरंतर क्रियाएं। जैसे—किसान द्वारा खेत की जुताई, बीजारोपण, सिंचाई, निराई और फसल की सुरक्षा करना। वैद्य के संदर्भ में—रोग का बार-बार निदान करना, रोगी को औषधि सेवन कराना, पथ्य-अपथ्य का पालन करवाना, और ईश्वर, माता-पिता, गुरु, देवता व ब्राह्मण के प्रति भक्ति भाव रखना।
५. दैव (प्राकृतिक/दैवीय परिस्थितियां)
अनुकूल या प्रतिकूल बाहरी परिस्थितियां। जैसे—समय पर वर्षा होना। यदि अचानक बाढ़ (जैसे नेपाल या असम में आई बाढ़) या भूकंप आ जाए, तो यह दैव है।
श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक १५ — कर्म का कारण
"शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥"
अर्थ: मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से शास्त्र के अनुकूल (न्यायसंगत) या शास्त्र के विपरीत जो कोई भी कर्म आरंभ करता है, उसके पीछे भी वही पाँच कारण (अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव) ही उत्तरदायी होते हैं।
सिद्धांत का निष्कर्ष
केवल यह कह देना कि "मैंने बहुत श्रम किया, इसलिए मेरी फसल अवश्य अच्छी होगी" यह पूर्ण सत्य नहीं है, क्योंकि दैव (परिस्थिति) अनुकूल होना भी आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर, सब कुछ भाग्य पर छोड़कर खेत में मेहनत न करना भी गीता के इस सिद्धांत के सर्वथा विरुद्ध है। मनुष्य को सदैव पुरुषार्थ करना चाहिए। जैसा कि ऋग्वेद के चौथे मंडल (३३वें सूक्त) में भी कहा गया है—"नर्ते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (देवता भी केवल परिश्रम करने वाले व्यक्ति की ही सहायता करते हैं)।
३. जीवन के व्यावहारिक मूल सूत्र — कौटिल्य अर्थशास्त्र व अन्य ग्रंथों से
सूत्र १: "असमाहितस्य वृत्तिर्न विद्यते"
अर्थ: जिसका मन एकाग्र, शांत या स्थिर नहीं है, उसकी आजीविका (वृत्ति) कभी स्थिर नहीं रह सकती। चंचल मन वाला व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता और हमेशा एक काम छोड़कर दूसरे काम की ओर भटकता रहता है।
व्यावहारिक उदाहरण: एक व्यक्ति नौकरी नहीं करना चाहता और सोचता है कि "मैं स्वतंत्र रूप से व्यापार करूँगा"। वह माता-पिता से धन लेकर दुकान खोलता है। व्यापार नहीं चला, तो वह नौकरी करने लगता है कि "चलो, बिना किसी टेंशन के महीने के २०-२५ हजार आ जाएंगे"। नौकरी में मालिक, ग्राहकों और परिस्थितियों की बातें सुननी पड़ती हैं, तो उसे लगता है कि यह पशु जैसा जीवन है। फिर वह बिना किसी अनुभव या ज्ञान के शेयर मार्केट के आकर्षण में आकर पैसा निवेश कर देता है और वहां भी अपना सारा धन गंवा बैठता है। यह असमाहित बुद्धि का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
तारक संहिता (महर्षि तारक) का पूरक सिद्धांत
- "एक विद्या सुरक्षित" - मनुष्य को किसी एक ही विद्या को अच्छी तरह सीखकर उसी से अपनी जीविका चलानी चाहिए, तभी वह सुरक्षित रहेगा।
- "एक देव चक्रदा" - किसी एक ही इष्ट देव की दृढ़ता से आराधना करने से यश और कीर्ति मिलती है।
- "एक वृत्ति धनदा" - निरंतर पुरुषार्थ के साथ किसी एक ही कार्य/व्यवसाय पर टिके रहने से वह भविष्य में धन देने वाला बनता है।
- "एकत्व मोक्षदा" - मन की सभी वृत्तियों को एकाग्र करके एक लक्ष्य में लगा देना ही आगे चलकर मोक्ष प्रदान करता है।
महर्षि तारक का 'हंस' सिद्धांत — विद्या ग्रहण करने का नियम
संसार में शास्त्र अनंत हैं और विद्याएं बहुत अधिक हैं, लेकिन मनुष्य की आयु बहुत कम है और उसमें विघ्न बहुत अधिक हैं।
इसलिए मनुष्य को केवल वही विद्या ग्रहण करनी चाहिए जो उसके लिए अत्यंत कल्याणकारी और अनुकूल हो। ठीक वैसे ही जैसे हंस को यदि दूध और पानी मिलाकर दिया जाए, तो वह केवल दूध पी लेता है और पानी को छोड़ देता है।
सूत्र २: "पूर्व निश्चित्य पश्चात् कार्यमारभेत"
अर्थ: कार्य शुरू करने से पहले भली-भांति विचार करके योजना बना लेनी चाहिए और निर्णय ले लेना चाहिए, उसके पश्चात ही कार्य आरंभ करना चाहिए। और एक बार कार्य आरंभ हो जाए, तो वह रुकना नहीं चाहिए।
चरक संहिता के अनुसार कार्य-नियोजन का उदाहरण — चिकित्सा सूत्र के ८ चरण
वैद्य के पास जब कोई रोगी आता है, तो वह सीधे औषधि नहीं देता, बल्कि पहले एक पूरी योजना बनाता है:
- रोग का निदान करना (मेरा मुख्य कार्य/लक्ष्य क्या है)।
- रोग मुक्ति का उपाय खोजना।
- चिकित्सा के साधन निश्चित करना (जैसे २५ प्रकार के कल्प, भस्म, जड़ी-बूटी या पंचकर्म)।
- देश-काल-परिस्थिति का विचार करना (कार्य न चला तो क्या बाधाएं या दुष्प्रभाव आ सकते हैं)।
- साध्य-असाध्य का निर्णय (कार्य में कितना लाभ होगा और असफल होने पर कितनी हानि सहनी पड़ सकती है)।
- औषधि की मात्रा और समय का निर्धारण (कार्य को कब, कैसे और किस मात्रा में करना है)।
- सफलता की संभावना का आकलन।
- रोगी और परिचारक का सहयोग व संतुष्टि सुनिश्चित करना (जैसे व्यापार में ग्राहकों की संतुष्टि का ध्यान रखा जाता है)।
इस प्रकार पूरी योजना बनाकर ही कार्य आरंभ करना चाहिए।
सूत्र ३: "कार्यस्य पूर्वमुपायांचिन्तयेत्"
अर्थ: कार्य शुरू करने से पहले ही उसके उपायों, अपने सामर्थ्य, स्थान, काल और होने वाले परिणाम के विषय में गहराई से सोच लेना चाहिए।
सूत्र ४: "कार्यान्तरे दीर्घसूत्रता न कर्तव्या"
अर्थ: कार्य करते समय या कार्य के बीच में अनावश्यक रूप से काम को लटकाना या टालना (दीर्घसूत्रता) नहीं चाहिए। १ मिनट का काम १० मिनट में करना, या १ दिन का काम ५ दिनों तक खींचना केवल खुद को ठगना और समय नष्ट करना है।
विद्यार्थी का उदाहरण
एक छात्र परीक्षा (जैसे IAS/IPS) की तैयारी की योजना बनाता है, पुस्तकें खरीदता है, कोचिंग भी जॉइन करता है। परंतु पढ़ाई के समय वह टालमटोल करता है कि "आज टीवी देख लेता हूँ, आज दोस्तों के साथ घूम लेता हूँ, आज मामा-मामी आए हैं तो कल से पढ़ूँगा"। यह दीर्घसूत्रता उसे कभी सफल नहीं होने देती।
चिकित्सा का उदाहरण
वैद्य रोगी को एक महीने की दवा देता है, लेकिन रोगी लापरवाही से उसे टाल-टालकर तीन-चार महीने तक खाता है, जिससे रोग ठीक नहीं होता और चिकित्सा असफल हो जाती है।
चरक संहिता (सिद्धि स्थान) का अत्यंत कड़ा नियम
यदि रोगी वैद्य के बताए नियमों या दवाओं में एक भी बात इधर की उधर (लापरवाही) कर देता है, तो यश की इच्छा रखने वाले उत्तम वैद्य को उस रोगी की चिकित्सा तुरंत छोड़ देनी चाहिए। यह नियम दिखाता है कि कार्य की सफलता के लिए अनुशासन और निर्देशों का पूर्णतः पालन करना कितना अनिवार्य है।
वशिष्ठ जी का उपदेश — वाल्मीकि रामायण
महर्षि वशिष्ठ जी राज्याभिषेक से पूर्व राम जी को समझाते हैं कि जो मनुष्य अपने पुरुषार्थ से दैव (भाग्य) के प्रतिकूल प्रभावों का सामना करता है, वह जीवन में कभी निराश नहीं होता। इसलिए जब तक कार्य में सफलता न मिले, तब तक "आराम हराम है" मानकर निरंतर चलते रहना चाहिए।
विजय और विश्राम का सिद्धांत
जब तक कार्य पूरा न हो जाए और सफलता न मिल जाए, तब तक बैठना नहीं चाहिए। ठीक उसी तरह जैसे जब तक शत्रु का पूरी तरह वध न हो जाए, तब तक हंसना या जीत की खुशी मनाना मूर्खता है। कार्य की पूर्ण सिद्धि के बाद ही विश्राम का स्थान होना चाहिए।
सूत्र ५: "न चलचित्तस्य कार्यव्याप्तिः"
अर्थ: चंचल चित्त वाले व्यक्ति को कभी भी कार्य की सिद्धि या उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होती।
गीता का उपदेश — अध्याय ६, ध्यान योग
मन अत्यंत चंचल और बेलगाम घोड़े की तरह है। यह जहाँ-जहाँ भागे, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर बार-बार अपनी आत्मा और लक्ष्य में स्थिर करना चाहिए।
पतंजलि योग दर्शन के दो महत्वपूर्ण सूत्र
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"
चंचल मन को वश में करने और भटकाव रोकने के संदर्भ में इस सूत्र को रेखांकित किया गया है।
अभ्यास की दृढ़ता का सूत्र:
"स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः"
इसका अर्थ है कि यदि किसी कार्य या अभ्यास में सफलता पानी है, तो उसे दीर्घ काल तक, बिना किसी अंतराल (निरंतर) और पूर्ण श्रद्धा व आदर भाव के साथ करना होगा। तभी उस कार्य का आधार (फाउंडेशन) मजबूत और अडिग होता है।
महाभारत — द्रोणाचार्य की परीक्षा का उदाहरण
जब गुरु द्रोणाचार्य पेड़ पर बैठी चिड़िया पर निशाना लगाने की परीक्षा लेते हैं, तो दुर्योधन आदि को पेड़, डालियां और पूरी चिड़िया दिखती है। परंतु एकाग्रचित्त अर्जुन कहते हैं कि उन्हें केवल "चिड़िया की आँख" (उनका लक्ष्य) दिखाई दे रही है। इसी एकाग्रता से कार्य सिद्ध होता है। (चोरी से विद्या ग्रहण करने वाला एकलव्य कभी सही मायने में लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर पाता)।
सूत्र ६: "हस्तगतस्याप्यवमाननात् कार्यव्यतिक्रमो भवति"
अर्थ: हाथ में आए हुए साधनों, अवसरों, धन, समय या सहायकों की उपेक्षा (अवमानना) करने से बना-बनाया कार्य भी बिगड़ जाता है और नष्ट हो जाता है।
व्यापार का उदाहरण
एक व्यक्ति के पास व्यापार शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी, दुकान, आवश्यक ज्ञान और अच्छे कर्मचारी उपलब्ध हैं। परंतु वह इस लालच में रुक जाता है कि "जब मुझे और अधिक पूंजी मिलेगी, तब शुरू करूँगा"। इस अवहेलना के कारण उसकी वर्तमान पूंजी भी नष्ट हो जाती है, दुकान कोई और ले लेता है और अच्छे कर्मचारी हाथ से निकल जाते हैं।
वैद्य का उदाहरण
वैद्य के पास रोगी के इलाज के लिए सभी साधन और दवाएं उपलब्ध हैं, परंतु वह उनका प्रयोग न करके किसी ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटी की कल्पना में बैठा रहता है जो अभी उसके पास नहीं है। इस बीच रोगी उसके हाथ से निकल जाता है।
ध्रुव-अध्रुव का सिद्धांत
"यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते..."
अर्थात जो निश्चित (ध्रुव) को छोड़कर अनिश्चित (अध्रुव) के पीछे भागता है, उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है और अनिश्चित तो पहले से ही नष्टप्राय है। इसलिए वर्तमान में उपलब्ध साधनों का आदर कर तुरंत कार्य में लग जाना चाहिए।
सूत्र ७: "दोषवर्जितानि कार्याणि दुर्लभानि"
अर्थ: संसार में ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो पूरी तरह से दोषरहित हो। हर काम में कहीं न कहीं कोई न कोई त्रुटि या कमी अवश्य होती है। इसलिए दोषरहित कार्य की खोज में बैठने के बजाय, जो कार्य जैसा मिल रहा है, उसे पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाना चाहिए और सफलता प्राप्त करनी चाहिए।
४. श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय — कर्म योग का श्लोक
व्याख्यान में कर्म की अनिवार्यता को समझाने के लिए एक और प्रसिद्ध श्लोक का सहारा लिया गया है:
"नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः"
अर्थ: अपने हिस्से के नियत कर्म को निरंतर करते रहो, क्योंकि कर्म न करने की तुलना में कर्म करना कहीं अधिक श्रेष्ठ है
गुरुदेव की अंतिम मंगलकामना और 'अर्थकरी विद्या' का आशीर्वाद
सत्र के बिल्कुल अंतिम क्षणों में, शांति पाठ के बाद गुरुदेव ने सभी शिष्यों और श्रोताओं को जीवन का सबसे बड़ा व्यावहारिक आशीर्वाद दिया:
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आशीर्वाद: परमात्मा से प्रार्थना है कि आप सभी "अर्थकरी विद्या" (वह विद्या जो केवल ज्ञान न दे, बल्कि आपके जीवन निर्वाह और रोजगार/धन प्राप्ति का साधन बने) को धारण करें। साथ ही, आपका समागम (संगति) हमेशा ऐसे गुरुओं और महान विद्वानों से होता रहे जो आपको ऐसी विद्या सिखा सकें।

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