भाग 2

 

वैद्यमित्र श्री सत्यवान नायक जी के इस व्याख्यान (भाग 2) का पूरा विवरण नीचे दिया गया है, 

जो आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों, स्वास्थ्य की वास्तविक परिभाषा, पंचमहाभूतों के महत्व और विभिन्न रोगों के वर्गीकरण व उनके उपचार पर आधारित है:



भाग 2

  • चिकित्सा पद्धतियों का वर्गीकरण: वैद्य जी के अनुसार, आयुर्वेद और भारत के अन्य प्राचीन ग्रंथों (जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वृहत्रयी और लघुत्रयी) में कुल 133 प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। यदि इनमें आज की दो मुख्य प्रतिस्पर्धी पद्धतियों—होम्योपैथी और एलोपैथी—को भी जोड़ दिया जाए, तो संसार में कुल 135 प्रकार की चिकित्सा पद्धतियां हो जाती हैं।

2. केवल आयुर्वेद को ही प्राथमिकता क्यों?

मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतनी चिकित्सा पद्धतियां होने के बावजूद केवल आयुर्वेद को ही महत्व क्यों दिया जाए? चरक संहिता के सूत्रों के आधार पर इसके निम्नलिखित कारण हैं:

  • जीवन का परम लक्ष्य: हर प्राणी के केवल दो ही मुख्य लक्ष्य होते हैं—ऐलौकिक सुख (इस लोक का सांसारिक व भौतिक सुख जैसे अच्छा घर, परिवार, गाड़ी, बैंक बैलेंस आदि) और पारलौकिक सुख (मृत्यु के बाद परलोक में मिलने वाला सुख व शांति)।
  • चतुर्वर्ग की प्राप्ति: मनुष्य का अंतिम कर्तव्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष (चतुर्वर्ग) का अधिकारी होने के लिए प्रथम तीन वर्ग (धर्म, अर्थ, काम) में संपन्न होना अनिवार्य है।
  • सृष्टि के चार स्वाभाविक नियम: बुद्धिमान मनुष्य सदा चार कर्मों में प्रवृत्त रहता है—जो प्राप्त नहीं है उसे पाना, जो मिल गया है उसे सुरक्षित करना, सुरक्षित की वृद्धि करना (जैसे संतान या वंश बढ़ाना), और अंत में सब कुछ त्याग देना (यदि हम स्वयं त्याग नहीं करेंगे, तो समय हमें त्याग देगा)।
  • स्वास्थ्य की अनिवार्यता: उपर्युक्त सभी पुरुषार्थ और कर्म तभी संभव हैं जब व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ हो। आयुर्वेद केवल रोगों की चिकित्सा नहीं करता, बल्कि रोग होने से पहले ही "सावधान" का बोर्ड लगाकर सचेत करता है ताकि जीवन में रोगों की दुर्घटना न हो।

3. आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य की वास्तविक परिभाषा

चरक संहिता के अनुसार, पूर्ण स्वस्थ होने के लिए केवल निरोगी होना काफी नहीं है, बल्कि निम्नलिखित मापदंडों का पूरा होना आवश्यक है:

  • समदोष: शरीर में वात, पित्त और कफ (त्रिदोष) संतुलित अवस्था में होने चाहिए।

  • समाग्नि: हमारे शरीर में 13 प्रकार की अग्नियां होती हैं (जिनमें मुख्य जठराग्नि है)। इनका संतुलित होना अनिवार्य है। यदि अग्नि तीव्र (धधकने लगे) तो पित्त विकार होंगे और यदि मंद हो जाए तो मंदाग्नि के कारण शरीर विकृत हो जाएगा।

  • समधातु: शरीर की सातों धातुएं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) समान मात्रा में रहनी चाहिए और उनका सही क्षय-वृद्धि संतुलन होना चाहिए।

  • सममलक्रिया (मल विसर्जन):

    • शौच क्रिया: सामान्य नियम के अनुसार व्यक्ति दिन में जितनी बार भोजन करता है, उतनी बार उसे शौच जाना चाहिए। हालांकि, राजीव भाई के संदर्भ से दिन में 1 या 2 बार शौच जाना ही उत्तम माना गया है, क्योंकि 'एक बार खाए वो योगी, दो बार खाए वो भोगी, तीन बार खाए वो रोगी'।
    • मूत्र विसर्जन: दिनभर में कम से कम 6 बार और अधिक से अधिक 8 बार मूत्र विसर्जन होना चाहिए। इससे कम या अधिक होना बीमारी का संकेत है।
    • अन्य मल विसर्जन: शरीर से पसीना निकलना, कानों व आंखों का मैल साफ होना, नाक से मैल निकलना, नाखूनों और बालों का सही बढ़ना भी आवश्यक है। आधुनिक समय में एसी (AC) के नीचे बैठे रहने से पसीना नहीं निकलता, जिससे विषैले तत्व शरीर के अंदर ही रहकर रोग उत्पन्न करते हैं।
  • प्रसन्न आत्मा, इंद्रिय और मन: व्यक्ति की आत्मा, मन और दसों इंद्रियां (5 ज्ञानेंद्रियां व 5 कर्मेंद्रियां - कुल 12 द्रव्य) सदैव प्रसन्न और शांत होनी चाहिए। आज के आधुनिक युग में लोग शारीरिक रूप से भले स्वस्थ दिखें, पर मानसिक व आत्मिक रूप से सुखी न होने के कारण पूर्ण स्वस्थ नहीं कहला सकते।

4. कर्म पुरुष और पंचमहाभूत का सिद्धांत

  • कर्म पुरुष: आयुर्वेद में शरीर को 'जड़' माना गया है, जिसमें चेतना का संचार आत्मा (चेतना शक्ति) रूपी बिजली से होता है। इसीलिए आत्मा को 'कर्म पुरुष' कहा गया है। आत्मा के शरीर छोड़ने पर इसे 'शव' या 'लाश' कहा जाता है।
  • पंचमहाभूत: हमारा शरीर आकाश, वायु, अग्नि (तेज), जल और पृथ्वी से मिलकर बना है। वात, पित्त और कफ इन्हीं पंचमहाभूतों पर आधारित हैं:
    • वात का संबंध वायु से है।
    • पित्त का संबंध अग्नि (सूर्य) से है।
    • कफ का संबंध जल (चंद्रमा) से है।
  • एक सुंदर घर की उपमा: यदि आयुर्वेद को एक घर मान लिया जाए, तो वात-पित्त-कफ उसके मुख्य पिलर (खंभे) हैं, मन उसकी दीवारें हैं, और त्रिगुण (सत्व, रज, तम) उसकी छत का काम करते हैं।
  • 15 तन्मात्राएं (गुण): पंचमहाभूतों के पंद्रह सूक्ष्म गुण शरीर का निर्माण करते हैं। आकाश में 1 गुण (शब्द), वायु में 2 गुण (शब्द, स्पर्श), अग्नि में 3 गुण (शब्द, स्पर्श, रूप), जल में 4 गुण (शब्द, स्पर्श, रूप, रस) और पृथ्वी में 5 गुण (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) पाए जाते हैं।

5. रोगों का वर्गीकरण

आयुर्वेद में रोगों और विकृतियों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

  1. स्वाभाविक रोग: जन्म-मृत्यु, समय पर भूख-प्यास लगना और नींद आना। ये शरीर की स्वाभाविक क्रियाएं हैं, जिन्हें पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
  2. शारीरिक रोग: वात, पित्त और कफ के असंतुलन से उत्पन्न होने वाले रोग (जैसे सर्दी, खांसी, शारीरिक दर्द आदि), जो दवाओं और उचित चिकित्सा से ठीक होते हैं।
  3. मानसिक रोग: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, भय और चिंता से उत्पन्न होने वाले विकार।
  4. आगंतुक रोग: बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक आने वाले कष्ट या दुर्घटनाएं (जैसे पैर फिसलना, भूकंप या यात्रा के दौरान लगी चोटें)।

6. सत्र के दौरान पूछे गए प्रश्न और वैद्य जी के सुझाव

  • श्वास (सांस) की तकलीफ का उपचार: एक 25 वर्षीय महिला रोगी को होने वाली सांस की तकलीफ के लिए वैद्य जी ने बताया कि प्रसव के बाद शरीर में स्नेह (चिकनाई) की कमी के कारण ऐसा होता है।
    • सुझाव: प्रतिदिन रात को सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध में देसी गाय का घी (पाचन क्षमता के अनुसार) मिलाकर खड़े होकर पीएं और तुरंत सो जाएं (दूध पीने के बाद टीवी/मोबाइल न देखें)। इसके अलावा, नाक में गाय का घी डालने और आवश्यकतानुसार दालचीनी का चूर्ण गर्म पानी या गुड़ के साथ लेने की सलाह दी। पूर्ण स्वस्थ होने के लिए लगभग 4 से 10 किलो घी का सेवन करना पड़ सकता है।
  • त्वचा/शारीरिक तकलीफ व खुजली की समस्या: सेना में धूल-मिट्टी में काम करने वाले एक 23 वर्षीय युवक की शारीरिक तकलीफ के लिए औषधियां सुझाई गईं:
    • सुझाव: अविपत्तिकर चूर्ण का एक-एक चम्मच दिन में दो या तीन बार (भोजन के बाद) सेवन करें। इसके अलावा, 100 ग्राम सरसों के तेल में 5 ग्राम सेंधा नमक डालकर हल्की आंच पर पकाएं। इस तेल को ठंडा करके शीशी में रख लें और सुबह स्नान से पहले तथा रात को सोने से पहले पूरे शरीर पर मालिश करें।
  • कम मूत्र विसर्जन की समस्या: यदि मूत्र विसर्जन दिन में 6 बार से कम होता है, तो यह शरीर में पानी की कमी या अत्यधिक जठराग्नि (पित्त/गर्मी) के कारण जल तत्व के सूखने का संकेत है।

वैद्य सत्यवान नायक जी के व्याख्यान में इसके आगे शरीर की सूक्ष्म संरचना, क्रियाविज्ञान और आयुर्वेद के गूढ़ रहस्यों को समझाने के लिए सुश्रुत संहिता के इस मूल सिद्धांत पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है:

"दोषधातुमल मूलं ही शरीरम्"

इसका अर्थ है कि हमारे शरीर के मुख्य आधार (मूल या जड़) तीन ही तत्व हैं—दोष, धातु और मल। जिस प्रकार किसी वृक्ष की जड़ें जमीन के नीचे छिपी होती हैं और दिखाई नहीं देतीं, लेकिन उनके बिना वृक्ष का न तो जन्म हो सकता है, न विकास और न ही वह जीवित रह सकता है; ठीक उसी प्रकार दोष, धातु और मल हमारे शरीर के भीतर अदृश्य रहकर इसे जीवन और गति प्रदान करते हैं। यदि इनमें से किसी एक का भी अभाव हो जाए, तो शरीर का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

इसके आगे के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. दोषों का वास्तविक स्वरूप और परिभाषा

  • दोष क्या हैं? वैद्य जी के अनुसार, "दूषयन्ति इति दोषाः" अर्थात जो तत्व हमारे शरीर को दूषित करने की क्षमता रखते हैं, उन्हें 'दोष' कहा जाता है।
  • दोषों की दोहरी प्रकृति: हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ सदैव विद्यमान रहते हैं। उदाहरण के लिए, हम चौबीसों घंटे सांस लेते हैं, जो कि वायु (वात) का प्रवाह है; सामान्य रूप से सांस लेना दोष नहीं है। परंतु जब इसमें कोई बाहरी विकृति या प्रतिकूलता मिल जाती है, तो यह शरीर को दूषित करने लगती है और रोगों का रूप ले लेती है।
  • संतुलन ही स्वास्थ्य है: जब तक ये तीनों दोष अपने निर्धारित स्तर या रेखा में संतुलित रहते हैं, तब तक कोई रोग नहीं होता। लेकिन जैसे ही वात, पित्त या कफ का स्तर उस रेखा से ऊपर (वृद्धि) या नीचे (क्षय) जाता है, शरीर तुरंत रोगी हो जाता है।

2. धातुओं की परिभाषा और शरीर धारण

  • धातु क्या हैं? जो तत्व शरीर को धारण और पोषित करते हैं, उन्हें 'धातु' कहा जाता है।
  • सप्तधातु का महत्व: हमारे शरीर में रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—ये सात धातुएं जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं।
    • यदि शरीर में रक्त धातु कम हो जाए, तो मनुष्य न तो ठीक से खड़ा हो सकता है और न ही चल सकता है; रक्त के बिना जीवन संभव नहीं है।
    • इसी प्रकार मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र के बिना मनुष्य का शारीरिक अस्तित्व और वंश वृद्धि असंभव है।

3. मल का सिद्धांत और विसर्जन की अनिवार्यता

  • मल क्या हैं? जो तत्व शरीर में आवश्यकता से अधिक मात्रा में या अधिक समय तक जमा रहते हैं और शरीर को मलिन (गंदा व विषैला) करते हैं, उन्हें 'मल' कहा जाता है।
  • मल विसर्जन क्यों जरूरी है? जिस प्रकार घर में जमा कचरे को रोज बाहर फेंकना जरूरी होता है, उसी प्रकार शरीर के कचरों (मलों) को बाहर निकालना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति का शौच (मल) रुक जाए या मूत्र (पेशाब) आना बंद हो जाए, तो मूत्राशय और आंतों में जमा होकर वे पूरे शरीर को विषैला कर देंगे, जिससे व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है।
  • पसीने का महत्व: पसीना भी शरीर का एक मुख्य मल है। आधुनिक जीवनशैली में लोग एयर कंडीशनर (AC) और कूलर के नीचे बैठे रहते हैं, जिससे पसीना नहीं निकलता। इस कारण पसीने के माध्यम से निकलने वाले विषैले तत्व शरीर के भीतर ही रुक जाते हैं और अनेक गंभीर रोगों को जन्म देते हैं।

4. आचार्य चरक द्वारा दोष और मल को 'धातु' मानना

वैद्य जी ने एक बहुत ही सुंदर और गूढ़ सिद्धांत साझा किया कि आचार्य चरक ने वात-पित्त-कफ (दोष) और मूत्र-मल-पसीने (मल) को भी 'धातु' की संज्ञा दी है। सामान्यतः यह विरोधाभास लगता है कि जो दोष और मल हैं, वे धातु कैसे हो सकते हैं? इसका समाधान करते हुए बताया गया कि "जो भी तत्व शरीर को किसी न किसी रूप में धारण करता है, वह धातु है":

  • वात (वायु) धातु के रूप में: वायु के बिना हम हिल-डुल भी नहीं सकते। यदि शरीर में वायु का प्रवाह रुक जाए (जैसे पैरालिसिस या ब्लॉकेज होना), तो वह अंग काम करना बंद कर देता है। अतः वायु शरीर को धारण करती है।
  • पित्त (अग्नि) धातु के रूप में: यदि शरीर में पित्त (जठराग्नि) अत्यंत मंद हो जाए, तो भोजन का पाचन नहीं होगा और धातुएं नहीं बनेंगी। इसलिए पित्त भी शरीर का धारक है।
  • कफ (जल) धातु के रूप में: हमारे मुंह और गले में बनने वाली लार (कफ का स्वरूप) जीवन के लिए आवश्यक है। यदि लार सूख जाए और गला पूरी तरह शुष्क हो जाए, तो मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। इसलिए कफ भी शरीर को धारण करने वाली धातु है।
  • मल और मूत्र धातु के रूप में: मल और मूत्र का उचित समय तक शरीर में रहना और फिर विसर्जित होना भी शरीर की स्थिति को बनाए रखने (धारण करने) के लिए अनिवार्य है, इसलिए इन्हें भी विस्तृत अर्थ में धातु माना गया है।

5. शरीर के विभिन्न मलों (मैल) को साफ न करने के विशिष्ट दुष्प्रभाव

यदि हम दैनिक जीवन में शरीर के विभिन्न अंगों के मलों की सफाई पर ध्यान नहीं देते, तो निम्नलिखित शारीरिक विकृतियां उत्पन्न होती हैं:

  • कान का मैल: यदि कान का मैल नियमित रूप से साफ न हो, तो धीरे-धीरे सुनने की शक्ति (श्रवण शक्ति) घटने लगती है।
  • आँख का मैल: सुबह सोकर उठने के बाद यदि आँखों का मैल ठीक से साफ न किया जाए, तो आँखों की दृष्टि शक्ति कमजोर होने लगती है।
  • नाक का मैल: स्नान करते समय यदि नाक के मैल को साफ न किया जाए, तो सूँघने की क्षमता (घ्राण शक्ति) कम हो जाती है।
  • नाखून और बाल: यदि नाखून और बालों को समय पर न काटा जाए और उनकी स्वच्छता का ध्यान न रखा जाए, तो शरीर में वात रोग, वायु रोग और दाँतों के रोग निश्चित रूप से उत्पन्न होते हैं।

6. स्वस्थ समृद्ध परिवार का संकल्प

  • तनाव (Tension) से मुक्ति: वैद्य जी ने स्पष्ट किया कि आधुनिक समय में लोग बहुत अधिक तनाव लेते हैं, जो रोगों का मुख्य कारण है। रोगों से बचने के लिए उन्होंने मनपसंद भजन या मधुर संगीत सुनने और हमेशा मानसिक रूप से प्रसन्न रहने की सलाह दी।

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