हेमन्त ऋतुचर्या (भाग - 1)
वैद्य सत्यबान नायक द्वारा 'स्वस्थ समृद्ध परिवार' (व्याख्यान संख्या 132) में दिए गए **हेमन्त ऋतुचर्या (भाग - 1)** के संपूर्ण व्याख्यान का एकीकृत, विस्तृत एवं क्रमानुसार संकलन:
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### 1. व्याख्यान पृष्ठभूमि, सूत्र एवं मंगलाचरण
* **सत्र परिचय:** यह व्याख्यान 15 नवंबर 2022 (मंगलवार) को 'स्वस्थ समृद्ध परिवार' के 'वैद्य निर्माण क्रांति' अभियान के अंतर्गत ग्रुप वॉइस चैट पर आयोजित किया गया था।
* **मंगल सूत्र (सुख के साधन):** व्याख्यान का शुभारंभ गुरु-स्मरण एवं आयुर्वेद के सुख-सूत्र से हुआ। आयुर्वेद में कहा गया है— *"अर्थागमो नित्यमरोगिता च..."* अर्थात जीवन में नित्य निरोगी रहना और निष्कंटक अर्थ (धन) का आगमन होना संसार के सबसे बड़े सुखों के साधन हैं।
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### 2. हेमंत ऋतु की समय-अवधि एवं कालगणना
आयुर्वेद में 1 वर्ष को 6 ऋतुओं (प्रत्येक 2-2 मास) में विभाजित किया गया है।
* **ऋतु अवधि:** हेमंत ऋतु कुल **59 दिन** (50 और 9 दिन) की होती है।
* **भारतीय वैदिक पंचांग के अनुसार:** मार्गशीर्ष मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि (बुधवार) रात्रि 4:00 बजे से प्रारंभ होकर 59 दिनों तक (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, शनिवार रात्रि 5:00 बजे तक) हेमंत ऋतु का प्रभाव धरती पर रहता है।
* **ईस्वी (ग्रेगोरियन) कैलेंडर के अनुसार:** 16 नवंबर 2022 रात्रि 4:00 बजे से 15 जनवरी 2023 प्रातः 5:00 बजे तक हेमंत ऋतु का समय काल माना जाता है।
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### 3. हेमंत ऋतु के मास-विशेष प्रभाव एवं उदाहरण
आयुर्वेदाचार्यों एवं ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसंधानों के अनुसार हेमंत ऋतु के दोनों मासों (प्रथम 30 दिन एवं द्वितीय 29 दिन) के अलग-अलग प्रभाव बताए गए हैं:
#### (क) जन्म लेने वाले बालकों का स्वभाव:
* **प्रथम मास (30 दिन) में जन्म:** बालक तीर्थवासी (तीर्थाटन व पवित्र नदियों में स्नान का प्रेमी), मीठे वचन बोलने वाला, परोपकारी, ईर्ष्या-द्वेष रहित, सद्बुद्धि व सद्भावना से संपन्न तथा व्यवसाय/व्यापार (बिजनेस) करने वाला होता है (वह खेती नहीं करता)।
* **द्वितीय मास (29 दिन) में जन्म:** बालक पिता की संपत्ति का व्यय/नाश करने वाला, तंत्र-मंत्र-यंत्र विद्या में निपुण तथा ज्ञान-संग्रह का अनुरागी होता है।
#### (ख) कन्या के प्रथम रजोदर्शन (पुष्पावती) का फल:
* **प्रथम मास में प्रथम रजस्वला होना:** वह कन्या अत्यधिक धार्मिक, घर-गृहस्थी के ज्ञान से भरपूर और परिवार को जोड़ने वाली (उत्तम बेटी, बहन, बहु व माता) बनती है।
* **द्वितीय मास में प्रथम रजस्वला होना:** वह कामातुरा (अधिक प्रेम/स्नेह की आकांक्षी) एवं उन्मादिनी (मस्तिष्क में चंचलता/उन्माद युक्त) स्वभाव वाली होती है।
#### (ग) वास्तु एवं संपत्ति क्रय का प्रभाव:
* **प्रथम मास में नया घर/दुकान/भूमि लेना:** धन-संपत्ति में निरंतर वृद्धि होती है, विशेषकर पूर्वमुखी (पूर्व द्वार) स्थान अत्यधिक लाभप्रद रहता है।
* **द्वितीय मास में स्थान/घर लेना:** चोरी व डकैती का भय रहता है; बाहरी लोगों, कर्मचारियों या स्वजनों द्वारा धन चोरी होने की आशंका बनी रहती है।
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### 4. प्राकृतिक स्वरूप, वायु-दिशा नियम एवं कालिदास-प्रसंग
#### (क) वातावरण व प्रवासी पक्षियों का आगमन:
* **हिमालय की हिम व धूलिकण:** हिमालय से आने वाली शीतल पवन के कारण आकाश में मंद-मंद वायु के साथ सूक्ष्म मिट्टी के कण (धूलिकण) व्याप्त हो जाते हैं।
* **प्रवासी पक्षियों का आगमन:** हेमंत ऋतु का मधुर प्राकृतिक रस व सौंदर्य मुख्य रूप से भारतवर्ष में ही प्रकट होता है। इसी कारण विदेशों (अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया आदि) से हज़ारों मील उड़कर 30-40 लाख प्रवासी पक्षी ओडिशा (चिलिका झील), झारखंड, गुजरात आदि भारतीय राज्यों में आते हैं।
#### (ख) उत्तर दिशा की वायु व पर्दे का नियम:
* **वायु का स्वभाव:** उत्तर दिशा से बहने वाली वायु में अग्नि का धुआँ व धूलिकण मिश्रित होने से वायु थोड़ी विकृत हो जाती है।
* **सावधानी व पर्दा:** हेमंत ऋतु में उत्तर दिशा की ओर मुख करके यात्रा न करें। जिन घरों का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में हो, वे **मोटा पर्दा लगाएँ** ताकि बाहरी वायु सीधे अंदर न आए, अन्यथा शरीर में **व्यान वायु** और **अपान वायु** कुपित होकर तीव्र कष्ट उत्पन्न करते हैं। *(दक्षिण-मुखी घरों के लिए यह वायु हितकर है)*।
#### (ग) शीत का वास्तविक कारण — महाकवि कालिदास का दृष्टांत:
व्याख्यान में प्रसंग आता है कि दो व्यक्ति आपस में विवाद कर रहे थे कि ठंड वर्षा (मेघ) के कारण लगती है या माघ/हेमंत के कारण। महाकवि कालिदास ने श्लोक के माध्यम से उनका समाधान किया: **"मेघ मध्य च माघ मध्य..."**।
* **सिद्धांत:** केवल मेघ या माघ होने से ठंड नहीं लगती; जब **वायु बहती है**, तभी ठंड का अनुभव होता है, क्योंकि शीतलता (शीतत्व) वायु का ही निज गुण है।
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### 5. दिनचर्या, भोजन-क्रम, जठराग्नि व धातुओं का विज्ञान
हेमंत ऋतु में दिन छोटा और रात्रि बड़ी होती है तथा शरीर की जठराग्नि अत्यंत तीव्र होती है।
#### (क) प्रातः सबसे पहले भरपेट भोजन का नियम:
* **अद्वितीय नियम:** सामान्य दिनों में पहले मालिश, फिर स्नान और बाद में भोजन किया जाता है; परंतु **हेमंत ऋतु में प्रातः शौच से निवृत्त होकर तुरंत पेट भर भोजन करना चाहिए**।
* **कारण (धातु-संरक्षण):** प्रातःकाल जठराग्नि इतनी प्रचंड होती है कि यदि भोजन न दिया जाए, तो कुपित वायु शरीर की रस, रक्त, मांस, मेद व शुक्र धातुओं को जलाने लगती है।
#### (ख) उपवास पर धन्वंतरि जी की चेतावनी:
* **चेतावनी सूत्र:** श्लोक— *"बाबा हर्ष शरद हेमंत..."* के अनुसार, जो शरद ऋतु में तो भरपेट खाता है परंतु **हेमंत ऋतु में उपवास (निराहार/व्रत)** रखता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान धन्वंतरि भी नहीं कर सकते। हेमंत में दिन में **3 बार भरपेट भोजन** करने का विधान है।
#### (ग) आभामंडल एवं ओज का सिद्धांत:
* आहार से रस \\(\rightarrow\\) रक्त \\(\rightarrow\\) मांस \\(\rightarrow\\) मेद \\(\rightarrow\\) अस्थि \\(\rightarrow\\) मज्जा \\(\rightarrow\\) शुक्र \\(\rightarrow\\) **ओज** का निर्माण होता है। महापुरुषों व देवी-देवताओं के मस्तक के पीछे दिखने वाला 'आभामंडल' इसी ओज व शुक्र धातु की प्रचुरता का प्रतीक है। भूखे रहने से शुक्र धातु नष्ट हो जाती है।
#### (घ) भोजन के बाद अभ्यंग, व्यायाम व स्नान का क्रम:
1. **प्रातः भोजन:** शौच के पश्चात तुरंत भरपेट भोजन करें।
2. **तेल मालिश (अभ्यंग):** भोजन के 1-2 घंटे बाद (प्रातः 9:00 से 9:30 बजे) पूरे शरीर में तेल मालिश करें।
3. **व्यायाम/कसरत:** तेल लगी त्वचा के साथ ही व्यायाम, कसरत या कुश्ती करें।
* *वैज्ञानिक कारण:* प्रातः भोजन से बढ़ा हुआ कफ मालिश व व्यायाम करने से संतुलित हो जाता है और जठराग्नि मंद नहीं पड़ती। व्यायाम के बाद अंकुरित मूंग/उड़द का सेवन करें।
4. **स्नान का नियम:** प्रातः स्नान **कुएँ के जल** से करें, और दोपहर (अपराह्न) में स्नान **नदी या तालाब** में करें।
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### 6. तेल मालिश नियम, औषधीय केश-तैल योग एवं वस्त्र-विधान
#### (क) सिर व शरीर के तेल का पृथक्करण नियम:
* जो तेल सिर (मस्तक) में लगाया जाए, उसे शरीर पर न लगाएँ; और जो शरीर पर लगाया जाए, उसे सिर में न लगाएँ।
* यदि एक ही तेल दोनों जगह लगाया गया, तो **प्राण, व्यान और उदान वायु** कुपित होकर रोग उत्पन्न करेंगे। शरीर की मालिश हेतु नारायण तेल, महानारायण तेल, विषगर्भ तेल या प्रसारिणी तेल का प्रयोग करें।
#### (ख) विशेष औषधीय केश-तैल योग:
हेमंत ऋतु में प्रतिदिन सिर में तेल मालिश करने से कभी बीपी, बाल झड़ना/सफेद होना, नेत्र रोग, गले का कैंसर, ब्रेन ट्यूमर या पैरालिसिस जैसी गंभीर व्याधियाँ नहीं होतीं।
* **तेल का अनुपात:**
* **तिल का तेल (तिल तैल):** 100 ml
* **नारियल का तेल:** 50 ml (तिल तेल का आधा)
* **अरण्डी (कैस्टर) का तेल:** 25 ml (नारियल तेल का आधा)
* तीनों को मिलाकर शीशी में रख लें और प्रतिदिन **अपराह्न काल** (दोपहर 3:00 बजे से सूर्यास्त के पूर्व) सिर में मालिश करें।
#### (ग) लाल रंग के वस्त्र व 5-तंत्रिका विज्ञान:
* **वस्त्र विधान:** हेमंत ऋतु में दिन भर लाल, गुलाबी (Pink) या लाल रंग के कंबल, स्वेटर अथवा चादर का प्रयोग अधिक करें।
* **शास्त्र-वचन:** शास्त्रानुसार हेमंत में जिनके पास लाल वस्त्र नहीं होते, उन्हें दुर्भाग्यशाली माना गया है।
* **वैज्ञानिक रहस्य:** लाल रंग का प्रकाश शरीर की **5 मुख्य प्रणालियों**— **नाड़ी तंत्र, धमनी तंत्र, सिरा तंत्र, स्नायु तंत्र और त्वचा तंत्र** को बल प्रदान कर संतुलित रखता है।
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### 7. आहार-विहार, षड्रस, उड़द व स्थानीय परंपराएं
#### (क) रसात्मक सेवन विधान:
* **प्रचुर सेवन:** मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा) और लवण (नमकीन) रस का अधिक सेवन करें। मधुर रस धातुओं का पोषण करता है तथा अम्ल व लवण रस जठराग्नि को सम रखते हैं।
* **सीमित सेवन:** कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला) रस कम मात्रा में लें।
#### (ख) खाद्य पदार्थ एवं क्षेत्रीय परंपराएं:
* **नया चावल (नवीन धान):** हेमंत ऋतु में नया चावल खाना चाहिए, क्योंकि यह कफ-वर्धक होकर वात का शमन करता है।
* **तिल, गुड़ व दुग्ध:** तिल, तिल तेल, गुड़, खांड, मिश्री, बूरा का प्रचुर प्रयोग करें। रात्रि में सोने से पूर्व **दूध में घी या मलाई** डालकर अवश्य पीएँ।
* **उड़द व मूंग:** अंकुरित मूंग/उड़द अथवा उड़द दाल के व्यंजनों का सेवन शुक्र व रक्त धातु को पुष्ट करता है।
* **ओडिशा की 'प्रथम अष्टमी' परंपरा:** मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी (प्रथम अष्टमी) से जगन्नाथ पुरी मंदिर एवं ओडिशा के घरों में उड़द दाल से बने इडली, डोसा, बड़ा आदि का भोग व सेवन प्रारंभ होता है।
* **प्रकृति अनुसार आहार:** सात्विक व्यक्ति उड़द-मूंग दाल व पारंपरिक मिठाइयाँ (पिष्टी) खाएँ; राजसिक पूरी-कचौरी तथा तामसिक जन मांस-रस का सेवन कर सकते हैं।
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✨ यह व्याख्यान का पूर्ण, प्रामाणिक एवं एकीकृत संकल

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