शिशिर ऋतुचर्या 156
वैद्य निर्माण क्रांति महाअभियान (व्याख्यान 156) में वर्णित शिशिर ऋतुचर्या और आयुर्वेद सिद्धांतों का संपूर्ण, संयुक्त व विस्तृत विवरण नीचे प्रस्तुत है:
1. काल गणना, तिथि व सटीक समय
- भारतीय काल गणना (विक्रम संवत): शिशिर ऋतु का प्रारंभ माघ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से होता है और यह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक रहता है (कुल 2 महीने यानी 60 दिन, 30-30 दिन के दो मास)।
- आरंभ का सटीक सूक्ष्म समय: माघ कृष्ण अष्टमी की रात्रि के चतुर्थ प्रहर (सूर्योदय से लगभग 56 घटी बीत जाने पर) शिशिर का उदय होता है। चूंकि भारतीय काल गणना में वार परिवर्तन सूर्योदय से माना जाता है, इसलिए इसे शनिवार की रात्रि व रविवार की भोर (सुबह 5:00 बजे) का संधि काल कहा गया है।
- समाप्ति का सटीक सूक्ष्म समय: इसका अंत चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि को बुधवार के दिन सूर्योदय से 22 घटी बीतने पर (दोपहर लगभग 3:00 बजे) होता है।
- क्रिश्चियन (अंग्रेजी) काल गणना: यह 15 जनवरी (सुबह 5:00 बजे) से आरंभ होकर चैत्र कृष्ण अष्टमी की दोपहर लगभग 3:00 बजे तक प्रभावी रहता है।
2. प्रकृति, सूर्य-गति व त्रिदोषों की स्थिति
- आदान काल (उत्तरायण) का प्रारंभ: चरक संहिता के अनुसार शिशिर ऋतु से आदान काल (उत्तरायण) आरंभ होता है। इसमें सूर्य की किरणें प्रखर होने लगती हैं और वे पृथ्वी तथा प्राणियों से सौम्य गुणों व जल का शोषण करने लगती हैं।
- दोषों की स्थिति: वातावरण में रूखापन (रुक्षता) अत्यधिक बढ़ जाता है। हेमंत ऋतु में केवल वात कुपित होता था, परंतु शिशिर में वात दोष के साथ-साथ कफ दोष भी बढ़ता व विकृत होता है।
- अग्नि व शरीर बल: जठराग्नि धीरे-धीरे मंद होने लगती है तथा शरीर दुर्बलता की ओर बढ़ता है। पित्त, तिक्त व कषाय रसों की वृद्धि से अंदरूनी दाह (जलन) और सुई चुभने जैसी पीड़ा उत्पन्न हो सकती है।
3. शिशिर के दोनों महीनों का सामाजिक, जैविक व प्राकृतिक प्रभाव
मास 1 (माघ कृष्ण अष्टमी से फाल्गुन कृष्ण अष्टमी - 30 दिन):
- बालक जन्म फल: इस महीने में जन्म लेने वाला बालक कुल का दीपक, सर्वविद्या का संग्रही, परम ज्ञानी, विद्वान, अच्छे आचरण वाला और योग-प्राणायाम व ईश्वरीय भक्ति में रुचि रखने वाला गृहस्थ (विवाहित) होता है।
- प्रथम रजोदर्शन (कन्या) फल: यदि किसी कन्या को इस महीने में प्रथम मासिक धर्म (प्रथम ऋतुवती) होता है, तो वह पुत्रवती होगी; परंतु उसके शरीर में हार्मोनल असंतुलन (Hormone Imbalance), पित्त वृद्धि, चिड़चिड़ापन और क्रोध अधिक रहेगा।
- वर्जित कार्य: इस प्रथम मास में नया घर खरीदना, नई दुकान खोलना या नया व्यापार/शिल्प/संस्था शुरू करना सख्त मना है। इससे चोरी, आर्थिक हानि, घर के सदस्यों तथा कर्मचारियों में रोग होने की संभावना रहती है।
मास 2 (फाल्गुन कृष्ण अष्टमी से चैत्र कृष्ण अष्टमी - 30 दिन):
- बालक जन्म फल: इस महीने में जन्मा बालक सूक्ष्म बुद्धि संपन्न, परम विद्वान, नम्र और विनीत स्वभाव का होता है। क्रोध आने पर वह एकांत में चला जाता है और शांत होने पर स्वयं आकर भूल स्वीकार करता है।
- प्रथम रजोदर्शन (कन्या) फल: यदि दूसरे महीने में प्रथम रजोदर्शन होता है, तो वह कन्या सर्वगुण संपन्न होगी तथा समाज व राष्ट्र कल्याण करने वाली उच्च बुद्धि संपन्न संतानों (जैसे भाई राजीव दीक्षित जी) को जन्म देगी।
- शुभ कार्य फल: इस दूसरे महीने में नया घर, दुकान या संस्था आरंभ करने से धन-समृद्धि, व्यापार और प्रगति में निरंतर वृद्धि होती है।
4. शास्त्रीय संदर्भ एवं प्रांतीय भिन्नता
- अष्टांग हृदय (वाग्भट जी): तीसरे अध्याय के 17वें श्लोक में आचार्य वाग्भट जी ने हेमंत और शिशिर को समान शीत वाला मानते हुए शिशिर की पृथक चर्चा छोड़ दी है। किंतु चरक, सुश्रुत, भेल, शार्ङ्गधर, अत्रेय व पद्म संहिताओं में उत्तरायण (आदान काल) के कारण दोनों में स्पष्ट अंतर बताया गया है।
- भाव प्रकाश (गंगा उत्तर व दक्षिण का भेद):
- गंगा के दक्षिण (दक्षिण भारत): अत्यधिक वर्षा के कारण वर्षा ऋतु के दो भाग किए जाते हैं (प्रवृट् व वर्षा), परंतु वहां शिशिर को हेमंत से अलग ऋतु नहीं माना जाता।
- गंगा के उत्तर (उत्तर भारत): यहां शिशिर में शीत का स्वरूप बदलता है और सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है, इसलिए उत्तर भारत में शिशिर को स्वतंत्र ऋतु माना जाता है।
5. आहार-विहार के नियम (पथ्य एवं अपथ्य)
क) वर्जित आहार (अपथ्य - इनका त्याग करें):
- मांसाहार पूर्णतः वर्जित: शिशिर के पूरे 60 दिनों तक किसी भी प्रकार का मांस, मटन, अंडा या मछली खाना सख्त मना है। इससे सूअर व अन्य पशुओं के मांस जैसे तमोगुण, क्रोध, क्रूरता और भयंकर पित्त-दोष बढ़ते हैं।
- वर्जित दालें: हेमंत ऋतु में खाई जाने वाली उड़द, अरहर (तूर) और चार की दाल तुरंत बंद कर दें; इनसे हृदय संबंधी विकार, वायु वृद्धि और अम्लपित्त (Acidity) बढ़ता है।
- वर्जित फल व सब्जियां: मूली, गाजर, जंगली बेर, खजूर (छुआरा) और केला का सेवन न करें। ये शरीर में कफ को विकृत करके खांसी, जुकाम, बंद नाक, सिरदर्द, गले में दर्द, साइनस और मस्तिष्क सुषुम्ना ज्वर (Cerebrospinal Fever) पैदा करते हैं।
- अकेला गुड़ निषेध: केवल अकेला गुड़ खाने से गुदा द्वार (Rectum) पर दुष्प्रभाव पड़ता है। गुड़ को हमेशा तिल, दही, मूंगफली या बाजरे की रोटी के साथ मिलाकर खाएं।
- गेहूं बनाम चावल (पद्म संहिता): पद्म संहिता के अनुसार इस ऋतु में गेहूं की तुलना में चावल का सेवन अधिक करना चाहिए।
ख) पथ्य एवं लाभदायक आहार (इनका सेवन करें):
- दालें: केवल मूंग की दाल या चने की दाल का सेवन करें।
- तिल के लड्डू: गुड़ और तिल से बने लड्डू प्रतिदिन खाएं। प्रति व्यक्ति प्रति माह 1 किलो (दोनों महीनों में कुल 2 किलो तिल के लड्डू) खाना शास्त्रीय विधान है। यह वात-शमन, अग्निवर्धक, पित्त-शामक और कफनाशक है।
- देसी गाय का शुद्ध घी: रात को सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध में 3 से 3.5 चम्मच देसी गाय का शुद्ध घी मिलाकर पिएं (प्रति माह 1 किलो / कुल 2 किलो घी)। यह दिन में तिल खाने से बढ़ने वाले पित्त/दाह से सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
- आंवला व गन्ना: इस ऋतु में कुल 200 आंवले (प्रति माह 100 आंवले, लगभग 3-4 प्रतिदिन) खाएं। शाम को या रात को सोने से पहले गन्ना अवश्य चूसें।
- खिचड़ी व अदरक का अचार: दोपहर में खिचड़ी खाएं। शास्त्रीय नियम है: "खिचड़ी के चार यार — घी, पापड़, दही, अचार"।
- अदरक अचार विधि: अदरक में हींग, सेंधा नमक और घी मिलाकर अचार बनाएं (संभव हो तो इसमें आम, लिसोड़ा या सोड़ा भी मिला सकते हैं)।
- अन्य भोज्य पदार्थ: अरबी, जिमीकंद (सूरन), मलाई, खास पूरी, मोहनभोग, बर्फी, पेड़ा, खुरचन आदि रसदार व शक्तिवर्धक पदार्थ खाएं।
- भोजनोत्तर नियम: भोजन के तुरंत बाद 1 लौंग और थोड़ा जायफल मुंह में रखकर चूसें; यह कफ व वात को शांत कर मंद अग्नि को प्रदीप्त करता है।
- कफ-निवारक चूर्ण: प्रातः शिव दर्शन के बाद खाली पेट आधा चम्मच हरड़ (हरीतकी) चूर्ण + आधा चम्मच पिप्पली चूर्ण को 1-2 चम्मच शहद में मिलाकर चाटें।
6. दिनचर्या, स्नान व शारीरिक देखभाल के नियम
- सिर पर तेल मालिश निषेध: शिशिर ऋतु के पहले 30 दिनों (प्रथम मास) तक सिर में तेल की मालिश बिल्कुल न करें। सिर में तेल लगाने से मन में हिंसा, ईर्ष्या, गाली-गलौज, क्रोध व काम-विकार बढ़ते हैं।
- धूप व अग्नि-ताप निषेध: हेमंत के विपरीत, शिशिर में तेज धूप में खड़े होना या शरीर को आग से सेकना मना है; इससे पित्त कुपित होकर रक्तचाप (बीपी) व हृदय विकार पैदा करता है।
- प्रातः शीतल जल से स्नान:
- सूर्योदय से पूर्व प्रातःकाल शीतल (सामान्य) जल से स्नान करें। गर्म पानी से स्नान न करें।
- जल शुद्धि सिद्धांत: प्लास्टिक की टंकी या फ्रिज में रुका हुआ जल 'मृतक जल' होता है। केवल कुएं, बावर्डी, नदी या तालाब का बहता हुआ जल ही 'जीवंत जल' है। टंकी के पानी से स्नान करने से बाल झड़ना, दोमुंहे बाल, दमा, साइनस, कफ, घुटनों का दर्द व पाचन रोग होते हैं। शहर में विवशता हो, तो पानी को मिट्टी के घड़े में रखकर ही प्रयोग करें।
- दिन में न सोएं व सीमित भोजन: दिन में सोना पूर्णतः वर्जित है। दिन में केवल दो बार (दोपहर व रात) थोड़ा कम पेट भरकर भोजन करें।
- कानों की सुरक्षा: घर से बाहर निकलते समय दोनों कानों में रुई (दत्त) लगाएं ताकि ठंडी शुष्क वायु से वात न कुपित हो।
- समागम (मैथुन) निषेध ('जंबुक व्यवहार'):
- पत्नी के साथ शयन व आलिंगन संभव है, परंतु मैथुन/समागम पूर्णतः वर्जित है।
- शिशिर में समागम करने से व्यक्ति में 'जंबुक' (सियार/गीदड़) जैसा स्वभाव उत्पन्न होता है—रात में अनिद्रा, दिन में थकान, आलस्य, वात-कफ के गंभीर रोग, दमा और हृदय दुर्बलता होती है।
7. आध्यात्मिक एवं पर्यावरणीय कर्तव्य
- शिव पूजन व बेलपत्र सेवन: प्रातः स्नान के बाद जूते पहनकर शिव मंदिर जाएं, स्वयं अपने हाथ से 5 बेलपत्र तोड़कर शिवलिंग पर अर्पित करें और उसमें से 1 बेलपत्र का प्रसाद रूप में सेवन करें। तत्पश्चात विष्णु सहस्त्रनाम पाठ या प्राणायाम करें।
- वृक्षारोपण (60 वृक्ष या 1 आम का पेड़):
- अपने अर्जित धन से 2 महीने में 60 वृक्ष (1 बरगद, 1 पीपल, 10 आंवला, 1 नीम, 3 आंवला, 3 बेल आदि) लगाएं।
- विकल्प: यदि यह संभव न हो, तो कम से कम 1 आम का वृक्ष अवश्य लगाएं और वर्षा ऋतु आने तक नियमित उसमें जल दें।
8. सिद्ध योग एवं मर्म चिकित्सा (उल्टी/वमन निवारण)
सफर, यात्रा या सामान्य स्थिति में उल्टी/जी मिचलाने पर यकृत (Liver) संकुचित हो जाता है:
- नाभि लेप: नाभि पर थोड़ा सरसों का तेल लगाएं, फिर पीली सरसों को बारीक पीसकर पानी मिलाकर नाभि के चारों ओर लेप लगाएं। 5-10 मिनट बाद पोंछ लें (धोना नहीं है)।
- आहार्य उपाय: खट्टा अनार खाएं, कच्चा आम/अमचूर चूसें या 2-3 चम्मच शीतल जल पिएं; इससे यकृत प्रसारित होता है।
- अंस मर्म दाब: कंधे के पीछे दोनों तरफ स्थित अंस मर्म (अंस फलक) को 10-20 बार दबाएं (उत्पीड़न करें); इससे 1 मिनट में उल्टी तुरंत बंद हो जाती है।
9. पूर्व ऋतुचर्या छूटने पर नियम (पद्म संहिता दृष्टांत)
- यदि शोक, अस्वस्थता आदि के कारण पिछली हेमंत ऋतुचर्या का पालन न हो सका हो, तो भी व्यक्ति को वर्तमान में चल रही शिशिर ऋतुचर्या के नियमों का ही सीधे पालन शुरू करना चाहिए।
- आचार्य का दृष्टांत: जैसे दोपहर के भोजन के निमंत्रण में न पहुंच पाने वाला अतिथि यदि शाम को पहुंचे, तो उसे शाम का ही ताजा भोजन परोसा जाता है, दोपहर का बचा हुआ नहीं; ठीक उसी प्रकार वर्तमान सूर्य गति के अनुसार सक्रिय ऋतु के नियमों का ही पालन करना चाहिए।
यह व्याख्यान 156 का पूर्ण, संयुक्त एवं प्रामाणिक विवरण है।

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