भाग 1

 

वैद्यमित्र श्री सत्यवान नायक जी द्वारा आयोजित 'आयुर्वेद आलोचना सत्र' +(स्वस्थ समृद्ध परिवार अभियान) 


1. स्वस्थ समृद्ध परिवार अभियान की पृष्ठभूमि और परिचय

  • अभियान की शुरुआत और विकास: इस अभियान की शुरुआत बहुत ही छोटे स्तर पर केवल 15-20 लोगों के साथ हुई थी। ये लोग आपस में अपने अनुभवों को साझा करते गए, जिससे धीरे-धीरे अन्य लोगों का विश्वास बढ़ता गया। यही 15-20 लोग आगे चलकर अपने परिचितों को जोड़ते गए और 'स्वस्थ भारत समृद्ध भारत' की परिकल्पना को आगे बढ़ाया। अंततः इस अभियान का नाम 'स्वस्थ समृद्ध परिवार' रखा गया।

  • श्री राजीव दीक्षित जी के विचारों से प्रेरणा: इस पूरे अभियान की नींव अमर क्रांतिकारी श्री राजीव दीक्षित जी के विचारों पर आधारित है। राजीव भाई ने अपना पूरा जीवन भारत की संस्कृति, सभ्यता और पहचान को बचाने में लगा दिया। उन्होंने आयुर्वेद को अत्यंत सरल भाषा में देश के आम नागरिकों तक पहुँचाया, जिससे करोड़ों लोग जागरूक हुए और इसी जागरूकता के परिणामस्वरूप आज स्वस्थ समृद्ध परिवार का निर्माण हुआ है।

  • वैद्य श्री सत्यवान नायक जी का परिचय: सत्र के मुख्य वक्ता वैद्य श्री सत्यवान नायक जी मूल रूप से ओडिशा के बरहामपुर नगर के निवासी हैं। उन्होंने ऋषियों के प्राचीन ज्ञान और विज्ञान की खोज में अपना जीवन समर्पित किया है और अथक अध्ययन के माध्यम से आयुर्वेद के गूढ़ सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

2. आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांत और महत्व

  • अनादि और शाश्वत विज्ञान: आयुर्वेद केवल जड़ी-बूटियों की कोई साधारण पुस्तक या दवाओं का भंडार नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक महासागर जैसा विज्ञान है। आयुर्वेद सृष्टि की तरह ही अनादि है। यदि सृष्टि का काल 1 लाख वर्ष है तो आयुर्वेद भी 1 लाख वर्ष पुराना है और यदि सृष्टि 1 करोड़ वर्ष पुरानी है तो आयुर्वेद भी 1 करोड़ वर्ष पुराना है।

  • स्वास्थ्य के प्रति आयुर्वेद का दृष्टिकोण: आयुर्वेद में चिकित्सा से अधिक स्वास्थ्य की रक्षा पर बल दिया गया है। वैद्य जी के अनुसार, आयुर्वेद के ग्रंथों में 90% ध्यान इस बात पर दिया गया है कि व्यक्ति बीमार ही न पड़े (स्वस्थ रहने के नियम), और केवल 10% ध्यान दवाओं और रोगों के निदान पर है।

  • अध्ययन हर नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार: आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करना और इसे पढ़ना केवल डॉक्टरों या वैद्यों का काम नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। जब तक देश का प्रत्येक नागरिक आयुर्वेद को नहीं अपनाएगा, तब तक ऋषियों के इस ज्ञान को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

3. 'आयु' की आयुर्वेदिक परिभाषा और सुश्रुत संहिता का संदर्भ

  • आयु की वास्तविक परिभाषा: सामान्य तौर पर लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक के काल को जीवन या आयु मानते हैं, परंतु सुश्रुत संहिता के अनुसार यह केवल 'जीवन' है, 'आयु' नहीं। गर्भ धारण (गर्भाधान संस्कार) के क्षण से लेकर मृत्यु तक के संपूर्ण काल को 'आयु' कहा जाता है।

  • गर्भ में पल रहे शिशु पर प्रभाव और जन्मजात रोग: आजकल बच्चों में जन्म से ही दिल में छेद होना, डायबिटीज होना या लिवर खराब होने जैसी विकृतियां पाई जाती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि माता-पिता (विशेषकर माता) ने गर्भावस्था के दौरान सही आहार-विहार का पालन नहीं किया। भोजन पचने के बाद जो 'रस' बनता है, उसी से शरीर की धातुओं का निर्माण होता है जो गर्भस्थ शिशु के शरीर और स्वास्थ्य को तय करती हैं।

4. रोगों का वर्गीकरण और औषधियों की विशालता

  • रोगों की संख्या: आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार कुल रोगों की संख्या 88,000 बताई गई है।

  • दोषों के आधार पर मुख्य रोग: मुख्य शारीरिक दोषों के आधार पर रोगों का वर्गीकरण इस प्रकार है:

    • वात दोष के रोग: 80 प्रकार के।

    • पित्त दोष के रोग: 40 प्रकार के।

    • कफ दोष के रोग: 20 प्रकार के।

    • इस प्रकार कुल 140 मुख्य प्रकार के दोषजन्य रोग होते हैं।

  • औषधियों की प्रचुरता: आयुर्वेद की विशेषता यह है कि एक ही रोग के लिए केवल एक औषधि नहीं होती। प्रकृति ने एक-एक रोग के लिए 600 प्रकार की औषधियों का प्रावधान किया है।

5. सत्र में पूछे गए प्रश्न और वैद्य जी द्वारा दिए गए विस्तृत समाधान

प्रश्न 1: गर्भावस्था के 8वें महीने में रक्त (हीमोग्लोबिन) की कमी

  • स्थिति: एक गर्भवती महिला का हीमोग्लोबिन घटकर 10.2 हो गया था (जो पहले 11.5 था)।

  • वैद्य जी की सलाह व समाधान:

    1. गर्भावस्था के इस चरण में हीमोग्लोबिन कम से कम 13 से 14 होना चाहिए।

    2. प्रतिदिन ताजे फल, विशेषकर अनार, सेब और नारियल पानी का प्रचुर मात्रा में सेवन करें। और च्यवनप्राश का नियमित सेवन करें।

    • सेवन विधि:  सुबह खाली पेट लें और च्यवनप्राश को भोजन के उपरांत लें। इसका सेवन प्रसव (डिलीवरी) होने तक लगातार जारी रखें।

    • लाभ: इससे हीमोग्लोबिन ठीक होगा, प्रसव सामान्य (Normal Delivery) होगा और होने वाला शिशु शारीरिक व मानसिक रूप से अत्यंत स्वस्थ, शांत और आज्ञाकारी पैदा होगा।

    1. परहेज: खट्टी चीजें, तली-भुनी चीजें और अत्यधिक नमक व नमकीन चीजों का सेवन तुरंत बंद कर दें या बेहद कम कर दें। गर्भावस्था के तीसरे महीने के बाद अधिक नमक खाने से शिशु में जन्मजात विकृति होने का खतरा रहता है।

प्रश्न 2: अचानक उल्टी और दस्त (Vomiting & Loose Motion)

  • स्थिति: भोजन करने के बाद अचानक उल्टी और दस्त की समस्या होना।

  • वैद्य जी की सलाह व समाधान:

    1. रसोई घर से दो लौंग लें।

    2. इन दो लौंग को दो कप पानी में डालकर तब तक उबालें जब तक पानी जलकर एक कप न रह जाए।

    3. इस काढ़े को हल्का गुनगुना (हल्का गर्म) होने तक रोकें और फिर धीरे-धीरे पी लें।

    4. इसे पीने के बाद आधे घंटे के भीतर उल्टी और दस्त पूरी तरह थम जाएंगे।

प्रश्न 3: टाइफाइड/मलेरिया के बाद पूरे शरीर में एलर्जी, खुजली और लाल दाने

  • स्थिति: बुखार ठीक होने के एक महीने बाद पीठ और कंधों पर शुरू हुई खुजली अब पूरे शरीर में लाल दानों के रूप में फैल गई है।

  • वैद्य जी की सलाह व समाधान:

    1. अजवाइन का प्रयोग: लगभग 100 ग्राम अजवाइन लें और उसे लोहे के तवे पर हल्का भून लें। भूनने के तुरंत बाद उसे तवे से उतारकर गर्म अवस्था में ही कूटकर बारीक चूर्ण बना लें।

    2. गुड़ का मिश्रण: इस तैयार चूर्ण में 300 ग्राम गुड़ मिलाएं। इसे अच्छे से कूटें और १०० प्रहार करें ताकि यह गोंद की तरह चिपकने वाला गाढ़ा मिश्रण बन जाए।

    3. गोली निर्माण: इस मिश्रण से लगभग 5-5 ग्राम की छोटी-छोटी गोलियाँ बना लें। इन गोलियों को किसी ठंडी जगह पर रखें (धूप या अत्यधिक गर्मी में रखने पर ये पिघल सकती हैं)।

    4. सेवन विधि: प्रतिदिन सुबह-शाम दो-दो गोलियों का गुनगुने पानी के साथ सेवन करें।

    5. अरंडी का तेल (Castor Oil): रात को सोने से पहले 6 चम्मच अरंडी का तेल गर्म दूध या गुनगुने पानी में मिलाकर पिएं।

    6. अवधि: इस पूरे प्रयोग को लगातार 15 दिनों तक अवश्य करें।

प्रश्न 4: जोड़ों और वात का दर्द (विशेषकर सर्दियों में और पित्ताशय के ऑपरेशन के बाद)

  • स्थिति: 38 वर्षीय महिला, जिनका पूर्व में गॉलब्लैडर का ऑपरेशन हो चुका है, सर्दियों के मौसम में जोड़ों का दर्द अत्यधिक बढ़ जाता है।

  • वैद्य जी की सलाह व समाधान:

    1. काढ़ा तैयार करना: एक मुट्ठी ताजे निर्गुंडी के पत्ते लें (यदि ताजे पत्ते न मिलें, तो बाजार से मिलने वाला निर्गुंडी रस प्रयोग करें)।

    2. इसमें बाजार से लाया हुआ दशमूल काढ़ा (लगभग 10 ग्राम) मिलाएं।

    3. इस काढ़े के साथ निम्नलिखित औषधियों का मिश्रण तैयार करें:

    • एक चम्मच अजवाइन

    • एक चम्मच सोंठ

    • एक चम्मच हल्दी

    • एक चम्मच शतावरी का पाउडर

    1. सेवन विधि: इस पूरे काढ़े को दिन में दो बार (एक बार सुबह और एक बार शाम को) कम से कम 2 से 3 महीने तक नियमित पिएं।

    2. बाहरी मालिश: रात को सोने से पहले दर्द वाले अंगों पर महानारायण तेल से अच्छी तरह मालिश करें।

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